कहानजैनशास्त्रमाळा ]
के [धर्मः किञ्चित् न जानाति] धर्म कांई जाणतो नथी, [तस्मात्] माटे [ज्ञानम् अन्यत्] ज्ञान अन्य छे, [धर्मं अन्यं] धर्म अन्य छे — [जिनाः ब्रुवन्ति] एम जिनदेवो कहे छे. [अधर्मः ज्ञानं न भवति] अधर्म (अर्थात् अधर्मास्तिकाय) ज्ञान नथी [यस्मात्] कारण के [अधर्मः किञ्चित् न जानाति] अधर्म कांई जाणतो नथी, [तस्मात्] माटे [ज्ञानम् अन्यत्] ज्ञान अन्य छे, [अधर्मं अन्यम्] अधर्म अन्य छे — [जिनाः ब्रुवन्ति] एम जिनदेवो कहे छे. [कालः ज्ञानं न भवति] काळ ज्ञान नथी [यस्मात्] कारण के [कालः किञ्चित् न जानाति] काळ कांई जाणतो नथी, [तस्मात्] माटे [ज्ञानम् अन्यत्] ज्ञान अन्य छे, [कालं अन्यं] काळ अन्य छे — [जिनाः ब्रुवन्ति] एम जिनदेवो कहे छे. [आकाशम् अपि ज्ञानं न] आकाश पण ज्ञान नथी [यस्मात्] कारण के [आकाशं किञ्चित् न जानाति] आकाश कांई जाणतुं नथी, [तस्मात्] माटे [ज्ञानं अन्यत्] ज्ञान अन्य छे, [आकाशम् अन्यत्] आकाश अन्य छे — [जिनाः ब्रुवन्ति] एम जिनदेवो कहे छे. [अध्यवसानं ज्ञानम् न] अध्यवसान ज्ञान नथी [यस्मात्] कारण के [अध्यवसानम् अचेतनं] अध्यवसान अचेतन छे, [तस्मात्] माटे [ज्ञानम् अन्यत्] ज्ञान अन्य छे [तथा अध्यवसानं अन्यत्] तथा अध्यवसान अन्य छे ( – एम जिनदेवो कहे छे).
[यस्मात्] कारण के [नित्यं जानाति] (जीव) निरंतर जाणे छे [तस्मात्] माटे [ज्ञायकः जीवः तु] ज्ञायक एवो जीव [ज्ञानी] ज्ञानी ( – ज्ञानवाळो, ज्ञानस्वरूप) छे, [ज्ञानं च] अने ज्ञान [ज्ञायकात् अव्यतिरिक्तं] ज्ञायकथी अव्यतिरिक्त छे ( – अभिन्न छे, जुदुं नथी) [ज्ञातव्यम्] एम जाणवुं.