Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
वर्णो ज्ञानं न भवति यस्माद्वर्णो न जानाति किञ्चित्
तस्मादन्यज्ज्ञानमन्यं वर्णं जिना ब्रुवन्ति ।।३९३।।
गन्धो ज्ञान न भवति यस्माद्गन्धो न जानाति किञ्चित्
तस्मादन्यज्ज्ञानमन्यं गन्धं जिना ब्रुवन्ति ।।३९४।।
न रसस्तु भवति ज्ञानं यस्मात्तु रसो न जानाति किञ्चित्
तस्मादन्यज्ज्ञानं रसं चान्यं जिना ब्रुवन्ति ।।३९५।।
स्पर्शो न भवति ज्ञानं यस्मात्स्पर्शो न जानाति किञ्चित्
तस्मादन्यज्ज्ञानमन्यं स्पर्शं जिना ब्रुवन्ति ।।३९६।।
कर्म ज्ञानं न भवति यस्मात्कर्म न जानाति किञ्चित्
तस्मादन्यज्ज्ञानमन्यत्कर्म जिना ब्रुवन्ति ।।३९७।।
धर्मो ज्ञानं न भवति यस्माद्धर्मो न जानाति किञ्चित्
तस्मादन्यज्ज्ञानमन्यं धर्मं जिना ब्रुवन्ति ।।३९८।।

के [रूपं किञ्चित् न जानाति] रूप कांई जाणतुं नथी, [तस्मात्] माटे [ज्ञानम् अन्यत्] ज्ञान अन्य छे, [रूपम् अन्यत्] रूप अन्य छे[जिनाः ब्रुवन्ति] एम जिनदेवो कहे छे. [वर्णः ज्ञानं न भवति] वर्ण ज्ञान नथी [यस्मात्] कारण के [वर्णः किञ्चित् न जानाति] वर्ण कांई जाणतो नथी, [तस्मात्] माटे [ज्ञानम् अन्यत्] ज्ञान अन्य छे, [वर्णम् अन्यम्] वर्ण अन्य छे[जिनाः ब्रुवन्ति] एम जिनदेवो कहे छे. [गन्धः ज्ञानं न भवति] गंध ज्ञान नथी [यस्मात्] कारण के [गन्धः किञ्चित् न जानाति] गंध कांई जाणती नथी, [तस्मात्] माटे [ज्ञानम् अन्यत्] ज्ञान अन्य छे, [गन्धम् अन्यम्] गंध अन्य छे[जिनाः ब्रुवन्ति] एम जिनदेवो कहे छे. [रसः तु ज्ञानं न भवति] रस ज्ञान नथी [यस्मात् तु] कारण के [रसः किञ्चित् न जानाति] रस कांई जाणतो नथी, [तस्मात्] माटे [ज्ञानम् अन्यत्] ज्ञान अन्य छे [रसं च अन्यं] अने रस अन्य छे[जिनाः ब्रुवन्ति] एम जिनदेवो कहे छे. [स्पर्शः ज्ञानं न भवति] स्पर्श ज्ञान नथी [यस्मात्] कारण के [स्पर्शः किञ्चित् न जानाति] स्पर्श कांई जाणतो नथी, [तस्मात्] माटे [ज्ञानम् अन्यत्] ज्ञान अन्य छे, [स्पर्शं अन्यं] स्पर्श अन्य छे[जिनाः ब्रुवन्ति] एम जिनदेवो कहे छे. [कर्म ज्ञानं न भवति] कर्म ज्ञान नथी [यस्मात्] कारण के [कर्म किञ्चित् न जानाति] कर्म कांई जाणतुं नथी, [तस्मात्] माटे [ज्ञानम् अन्यत्] ज्ञान अन्य छे, [कर्म अन्यत्] कर्म अन्य छे[जिनाः ब्रुवन्ति] एम जिनदेवो कहे छे. [धर्मः ज्ञानं न भवति] धर्म (अर्थात् धर्मास्तिकाय) ज्ञान नथी [यस्मात्] कारण

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