Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 406-407.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार
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ण वि सक्कदि घेत्तुं जं ण विमोत्तुं जं च जं परद्दव्वं
सो को वि य तस्स गुणो पाउगिओ विस्ससो वा वि ।।४०६।।
तम्हा दु जो विसुद्धो चेदा सो णेव गेण्हदे किंचि
णेव विमुंचदि किंचि वि जीवाजीवाण दव्वाणं ।।४०७।।
आत्मा यस्यामूर्तो न खलु स आहारको भवत्येवम्
आहारः खलु मूर्तो यस्मात्स पुद्गलमयस्तु ।।४०५।।
नापि शक्यते ग्रहीतुं यत् न विमोक्तुं यच्च यत्परद्रव्यम्
स कोऽपि च तस्य गुणः प्रायोगिको वैस्रसो वाऽपि ।।४०६।।
तस्मात्तु यो विशुद्धश्चेतयिता स नैव गृह्णाति किञ्चित्
नैव विमुञ्चति किञ्चिदपि जीवाजीवयोर्द्रव्ययोः ।।४०७।।
जे द्रव्य छे पर तेहने न ग्रही, न छोडी शकाय छे,
एवो ज तेनो गुण को प्रायोगी ने वैस्रसिक छे. ४०६.
तेथी खरे जे शुद्ध आत्मा ते नहीं कंई पण ग्रहे,
छोडे नहीं वळी कांई पण जीव ने अजीव द्रव्यो विषे. ४०७.

गाथार्थः[एवम्] ए रीते [यस्य आत्मा] जेनो आत्मा [अमूर्तः] अमूर्तिक छे [सः खलु] ते खरेखर [आहारकः न भवति] आहारक नथी; [आहारः खलु] आहार तो [मूर्तः] मूर्तिक छे [यस्मात्] कारण के [सः तु पुद्गलमयः] ते पुद्गलमय छे.

[यत् परद्रव्यम्] जे परद्रव्य छे [न अपि शक्यते ग्रहीतुं यत्] ते ग्रही शकातुं नथी [न विमोक्तुं यत् च] तथा छोडी शकातुं नथी, [सः कः अपि च] एवो ज कोई [तस्य] तेनो (आत्मानो) [प्रायोगिकः वा अपि वैस्रसः गुणः] प्रायोगिक तेम ज वैस्रसिक गुण छे.

[तस्मात् तु] माटे [यः विशुद्धः चेतयिता] जे विशुद्ध आत्मा छे [सः] ते [जीवाजीवयोः द्रव्ययोः] जीव अने अजीव द्रव्योमां (परद्रव्योमां) [किञ्चित् न एव गृह्णाति] कांई पण ग्रहतो नथी [किञ्चित् अपि न एव विमुञ्चति] तथा कांई पण छोडतो नथी.

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