तथात्तमादेयमशेषतस्तत् ।
पूर्णस्य सन्धारणमात्मनीह ।।२३६।।
श्लोकार्थः — [संहृत - सर्व - शक्ते : पूर्णस्य आत्मनः] जेणे सर्व शक्तिओ समेटी छे ( – पोतामां लीन करी छे) एवा पूर्ण आत्मानुं [आत्मनि इह] आत्मामां [यत् सन्धारणम्] धारण करवुं [तत् उन्मोच्यम् अशेषतः उन्मुक्त म्] ते ज छोडवायोग्य बधुं छोड्युं [तथा] अने [आदेयम् तत् अशेषतः आत्तम्] ग्रहवायोग्य बधुं ग्रह्युं.
भावार्थः — पूर्णज्ञानस्वरूप, सर्व शक्तिओना समूहरूप जे आत्मा तेने आत्मामां धारण करी राखवो ते ज, त्यागवायोग्य जे कांई हतुं ते बधुंय त्याग्युं अने ग्रहण करवायोग्य जे कांई हतुं ते बधुंय ग्रहण कर्युं. ए ज कृतकृत्यपणुं छे. २३६.
‘आवा ज्ञानने देह ज नथी’ — एवा अर्थनो, आगळनी गाथानी सूचनारूप श्लोक हवे कहे छेः —
श्लोकार्थः — [एवं ज्ञानम् परद्रव्यात् व्यतिरिक्तं अवस्थितम्] आम (पूर्वोक्त रीते) ज्ञान परद्रव्यथी जुदुं अवस्थित ( – निश्चळ रहेलुं) छे; [तत् आहारकं कथम् स्यात् येन अस्य देहः शङ्कयते] ते (ज्ञान) आहारक (अर्थात् कर्म - नोकर्मरूप आहार करनारुं) केम होय के जेथी तेने देहनी शंका कराय? (ज्ञानने देह होई शके ज नहि, कारण के तेने कर्म - नोकर्मरूप आहार ज नथी.) २३७.
हवे आ अर्थने गाथामां कहे छेः —
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