Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 408-409.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार
५७९
पासंडीलिंगाणि व गिहिलिंगाणि व बहुप्पयाराणि
घेत्तुं वदंति मूढा लिंगमिणं मोक्खमग्गो त्ति ।।४०८।।
ण दु होदि मोक्खमग्गो लिंगं जं देहणिम्ममा अरिहा
लिंगं मुइत्तु दंसणणाणचरित्ताणि सेवंति ।।४०९।।
पाषण्डिलिङ्गानि वा गृहिलिङ्गानि वा बहुप्रकाराणि
गृहीत्वा वदन्ति मूढा लिङ्गमिदं मोक्षमार्ग इति ।।४०८।।
न तु भवति मोक्षमार्गो लिङ्गं यद्देहनिर्ममा अर्हन्तः
लिङ्गं मुक्त्वा दर्शनज्ञानचारित्राणि सेवन्ते ।।४०९।।

केचिद्द्रव्यलिङ्गमज्ञानेन मोक्षमार्गं मन्यमानाः सन्तो मोहेन द्रव्यलिङ्गमेवोपाददते तदनुपपन्नम्; सर्वेषामेव भगवतामर्हद्देवानां, शुद्धज्ञानमयत्वे सति द्रव्यलिङ्गाश्रयभूत-

हवे आ अर्थने गाथामां कहे छेः

बहुविधनां मुनिलिंगने अथवा गृहस्थीलिंगने
ग्रहीने कहे छे मूढजन ‘आ लिंग मुक्तिमार्ग छे’. ४०८.
पण लिंग मुक्तिमार्ग नहि, अर्हंत निर्मम देहमां
बस लिंग छोडी ज्ञान ने चारित्र, दर्शन सेवता. ४०९.

गाथार्थः[बहुप्रकाराणि] बहु प्रकारनां [पाषण्डिलिङ्गानि वा] मुनिलिंगोने [गृहिलिङ्गानि वा] अथवा गृहीलिंगोने [गृहीत्वा] ग्रहण करीने [मूढाः] मूढ (अज्ञानी) जनो [वदन्ति] एम कहे छे के ‘[इदं लिङ्गम्] आ (बाह्य) लिंग [मोक्षमार्गः इति] मोक्षमार्ग छे’.

[तु] परंतु [लिङ्गम्] लिंग [मोक्षमार्गः न भवति] मोक्षमार्ग नथी; [यत्] कारण के [अर्हन्तः] अर्हंतदेवो [देहनिर्ममाः] देह प्रत्ये निर्मम वर्तता थका [लिङ्गम् मुक्त्वा] लिंगने छोडीने [दर्शनज्ञानचारित्राणि सेवन्ते] दर्शन - ज्ञान - चारित्रने ज सेवे छे.

टीकाःकेटलाक लोको अज्ञानथी द्रव्यलिंगने मोक्षमार्ग मानता थका मोहथी द्रव्यलिंगने ज ग्रहण करे छे. ते (द्रव्यलिंगने मोक्षमार्ग मानीने ग्रहण करवुं ते) अनुपपन्न अर्थात् अयुक्त छे; कारण के बधाय भगवान अर्हंतदेवोने, शुद्धज्ञानमयपणुं होवाने लीधे