शरीरममकारत्यागात्, तदाश्रितद्रव्यलिङ्गत्यागेन दर्शनज्ञानचारित्राणां मोक्षमार्गत्वेनोपासनस्य दर्शनात् ।
न खलु द्रव्यलिङ्गं मोक्षमार्गः, शरीराश्रितत्वे सति परद्रव्यत्वात् । दर्शनज्ञानचारित्राण्येव
मोक्षमार्गः, आत्माश्रितत्वे सति स्वद्रव्यत्वात् ।
द्रव्यलिंगने आश्रयभूत शरीरना ममकारनो त्याग होवाथी, शरीराश्रित द्रव्यलिंगना त्याग वडे दर्शनज्ञानचारित्रनी मोक्षमार्गपणे उपासना जोवामां आवे छे (अर्थात् तेओ शरीराश्रित द्रव्यलिंगनो त्याग करीने दर्शनज्ञानचारित्रने मोक्षमार्ग तरीके सेवता जोवामां आवे छे).
भावार्थः — जो देहमय द्रव्यलिंग मोक्षनुं कारण होत तो अर्हंतदेव वगेरे देहनुं ममत्व छोडी दर्शनज्ञानचारित्रने शा माटे सेवत? द्रव्यलिंगथी ज मोक्षने पामत! माटे ए नक्की थयुं के — देहमय लिंग मोक्षमार्ग नथी, परमार्थे दर्शनज्ञानचारित्ररूप आत्मा ज मोक्षनो मार्ग छे.
हवे ए ज सिद्ध करे छे (अर्थात् द्रव्यलिंगो मोक्षमार्ग नथी, दर्शन - ज्ञान-चारित्र ज मोक्षमार्ग छे — एम सिद्ध करे छे)ः —
गाथार्थः — [पाषण्डिगृहिमयानि लिङ्गानि] मुनिनां अने गृहस्थनां लिंगो [एषः] ए [मोक्षमार्गः न अपि] मोक्षमार्ग नथी; [दर्शनज्ञानचारित्राणि] दर्शन - ज्ञान-चारित्रने [जिनाः] जिनदेवो [मोक्षमार्गं ब्रुवन्ति] मोक्षमार्ग कहे छे.
टीकाः — द्रव्यलिंग खरेखर मोक्षमार्ग नथी, कारण के ते (द्रव्यलिंग) शरीराश्रित होवाथी परद्रव्य छे. दर्शन - ज्ञान - चारित्र ज मोक्षमार्ग छे, कारण के तेओ आत्माश्रित होवाथी स्वद्रव्य छे.
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