कहानजैनशास्त्रमाळा ]
यतो द्रव्यलिङ्गं न मोक्षमार्गः, ततः समस्तमपि द्रव्यलिङ्गं त्यक्त्वा दर्शनज्ञानचारित्रेष्वेव, मोक्षमार्गत्वात्, आत्मा योक्तव्य इति सूत्रानुमतिः ।
भावार्थः — मोक्ष छे ते सर्व कर्मना अभावरूप आत्मपरिणाम ( – आत्माना परिणाम) छे, माटे तेनुं कारण पण आत्माना परिणाम ज होवुं जोईए. दर्शन - ज्ञान - चारित्र आत्माना परिणाम छे; माटे निश्चयथी ते ज मोक्षनो मार्ग छे.
लिंग छे ते देहमय छे; देह छे ते पुद्गलद्रव्यमय छे; माटे आत्माने देह मोक्षनो मार्ग नथी. परमार्थे अन्य द्रव्यने अन्य द्रव्य कांई करतुं नथी ए नियम छे.
जो आम छे (अर्थात् जो द्रव्यलिंग मोक्षमार्ग नथी अने दर्शनज्ञानचारित्र ज मोक्षमार्ग छे) तो आम (नीचे प्रमाणे) करवुं — एम हवे उपदेश करे छेः —
गाथार्थः — [तस्मात्] माटे [सागारैः] सागारो वडे ( – गृहस्थो वडे) [अनगारकैः वा] अथवा अणगारो वडे ( – मुनिओ वडे) [गृहीतानि] ग्रहायेलां [लिङ्गानि] लिंगोने [जहित्वा] छोडीने, [दर्शनज्ञानचारित्रे] दर्शनज्ञानचारित्रमां — [मोक्षपथे] के जे मोक्षमार्ग छे तेमां — [आत्मानं युंक्ष्व] तुं आत्माने जोड.
टीकाः — कारण के द्रव्यलिंग मोक्षमार्ग नथी, तेथी समस्त द्रव्यलिंगने छोडीने दर्शनज्ञानचारित्रमां ज, ते (दर्शनज्ञानचारित्र) मोक्षमार्ग होवाथी, आत्माने जोडवायोग्य छे — एम सूत्रनी अनुमति छे.
भावार्थः — अहीं द्रव्यलिंगने छोडी आत्माने दर्शनज्ञानचारित्रमां जोडवानुं वचन छे ते सामान्य परमार्थ वचन छे. कोई समजशे के मुनि - श्रावकनां व्रतो छोडाववानो उपदेश छे. परंतु एम नथी. जेओ केवळ द्रव्यलिंगने ज मोक्षमार्ग जाणी भेख धारण करे छे, तेमने द्रव्यलिंगनो