Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Kalash: 240.

< Previous Page   Next Page >


Page 583 of 642
PDF/HTML Page 614 of 673

 

कहानजैनशास्त्रमाळा ]

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार
५८३

व्यावर्त्य दर्शनज्ञानचारित्रेषु नित्यमेवावस्थापयातिनिश्चलमात्मानं; तथा समस्तचिन्तान्तर- निरोधेनात्यन्तमेकाग्रो भूत्वा दर्शनज्ञानचारित्राण्येव ध्यायस्व; तथा सकलकर्मकर्मफलचेतनासंन्यासेन शुद्धज्ञानचेतनामयो भूत्वा दर्शनज्ञानचारित्राण्येव चेतयस्व; तथा द्रव्यस्वभाववशतः प्रतिक्षण- विजृम्भमाणपरिणामतया तन्मयपरिणामो भूत्वा दर्शनज्ञानचारित्रेष्वेव विहर; तथा ज्ञानरूप- मेकमेवाचलितमवलम्बमानो ज्ञेयरूपेणोपाधितया सर्वत एव प्रधावत्स्वपि परद्रव्येषु सर्वेष्वपि मनागपि मा विहार्षीः

(शार्दूलविक्रीडित)
एको मोक्षपथो य एष नियतो द्रग्ज्ञप्तिवृत्त्यात्मक-
स्तत्रैव स्थितिमेति यस्तमनिशं ध्यायेच्च तं चेतति
तस्मिन्नेव निरन्तरं विहरति द्रव्यान्तराण्यस्पृशन्
सोऽवश्यं समयस्य सारमचिरान्नित्योदयं विन्दति
।।२४०।।

प्रज्ञाना गुण वडे ज तेमांथी पाछो वाळीने तेने अति निश्चळपणे दर्शन - ज्ञान - चारित्रमां निरंतर स्थाप; तथा समस्त अन्य चिंताना निरोध वडे अत्यंत एकाग्र थईने दर्शन - ज्ञान - चारित्रने ज ध्या; तथा समस्त कर्मचेतना अने कर्मफळचेतनाना त्याग वडे शुद्धज्ञानचेतनामय थईने दर्शन - ज्ञान - चारित्रने ज चेतअनुभव; तथा द्रव्यना स्वभावना वशे (पोताने) जे क्षणे क्षणे परिणामो ऊपजे छे ते - पणा वडे (अर्थात् परिणामीपणा वडे) तन्मय परिणामवाळो (दर्शन - ज्ञानचारित्रमय परिणामवाळो) थईने दर्शन - ज्ञान - चारित्रमां ज विहर; तथा ज्ञानरूपने एकने ज अचळपणे अवलंबतो थको, जेओ ज्ञेयरूप होवाथी उपाधिस्वरूप छे एवां सर्व तरफथी फेलातां समस्त परद्रव्योमां जरा पण न विहर.

भावार्थःपरमार्थरूप आत्माना परिणाम दर्शन - ज्ञान - चारित्र छे; ते ज मोक्षमार्ग छे. तेमां ज (दर्शनज्ञानचारित्रमां ज) आत्माने स्थापवो, तेनुं ज ध्यान करवुं, तेनो ज अनुभव करवो अने तेमां ज विहरवुंप्रवर्तवुं, अन्य द्रव्योमां न प्रवर्तवुं. अहीं परमार्थे ए ज उपदेश छे केनिश्चय मोक्षमार्गनुं सेवन करवुं, केवळ व्यवहारमां ज मूढ न रहेवुं.

हवे आ ज अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः

श्लोकार्थः[द्रग् - ज्ञप्ति - वृत्ति - आत्मकः यः एषः एकः नियतः मोक्षपथः] दर्शन- ज्ञानचारित्रस्वरूप जे आ एक नियत मोक्षमार्ग छे. [तत्र एव यः स्थितिम् एति] तेमां ज जे पुरुष स्थिति पामे छे अर्थात् स्थित रहे छे, [तम् अनिशं ध्यायेत्] तेने ज निरंतर ध्यावे छे,