Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 415.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार
५८९
जो समयपाहुडमिणं पढिदूणं अत्थतच्चदो णादुं
अत्थे ठाही चेदा सो होही उत्तमं सोक्खं ।।४१५।।
यः समयप्राभृतमिदं पठित्वा अर्थतत्त्वतो ज्ञात्वा
अर्थे स्थास्यति चेतयिता स भविष्यत्युत्तमं सौख्यम् ।।४१५।।

यः खलु समयसारभूतस्य भगवतः परमात्मनोऽस्य विश्वप्रकाशकत्वेन विश्व- समयस्य प्रतिपादनात् स्वयं शब्दब्रह्मायमाणं शास्त्रमिदमधीत्य, विश्वप्रकाशनसमर्थ- परमार्थभूतचित्प्रकाशरूपमात्मानं निश्चिन्वन् अर्थतस्तत्त्वतश्च परिच्छिद्य, अस्यैवार्थभूते भगवति एकस्मिन् पूर्णविज्ञानघने परमब्रह्मणि सर्वारम्भेण स्थास्यति चेतयिता, स साक्षात्तत्क्षण-


परमात्माने, समयसारने) प्रत्यक्ष करतुं [इदम् एकम् अक्षयं जगत्-चक्षुः] आ एक (अद्वितीय) अक्षय जगत - चक्षु (समयप्राभृत) [पूर्णताम् याति] पूर्णताने पामे छे.

भावार्थःआ समयप्राभृत ग्रंथ वचनरूपे तेम ज ज्ञानरूपेबन्ने प्रकारे जगतने अक्षय (अर्थात् जेनो विनाश न थाय एवुं) अद्वितीय नेत्र समान छे, कारण के जेम नेत्र घटपटादिने प्रत्यक्ष देखाडे छे तेम समयप्राभृत आत्माना शुद्ध स्वरूपने प्रत्यक्ष अनुभवगोचर देखाडे छे. २४५.

हवे भगवान कुंदकुंदाचार्यदेव आ ग्रंथने पूर्ण करे छे तेथी तेना महिमारूपे तेना अभ्यास वगेरेनुं फळ गाथामां कहे छेः

आ समयप्राभृत पठन करीने, अर्थ - तत्त्वथी जाणीने,
ठरशे अरथमां आतमा जे, सौख्य उत्तम ते थशे. ४१५.

गाथार्थः[यः चेतयिता] जे आत्मा (भव्य जीव) [इदं समयप्राभृतम् पठित्वा] आ समयप्राभृतने भणीने, [अर्थतत्त्वतः ज्ञात्वा] अर्थ अने तत्त्वथी जाणीने, [अर्थे स्थास्यति] तेना अर्थमां स्थित थशे, [सः] ते [उत्तमं सौख्यम् भविष्यति] उत्तम सौख्यस्वरूप थशे.

टीकाःसमयसारभूत आ भगवान परमात्मानुंके जे विश्वनो प्रकाशक होवाथी विश्वसमय छे तेनुंप्रतिपादन करतुं होवाथी जे पोते शब्दब्रह्म समान छे एवा आ शास्त्रने जे आत्मा खरेखर भणीने, विश्वने प्रकाशवामां समर्थ एवा परमार्थभूत, चैतन्य - प्रकाशरूप आत्मानो निश्चय करतो थको (आ शास्त्रने) अर्थथी अने तत्त्वथी जाणीने, तेना ज अर्थभूत