Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

परिशिष्ट
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स्याद्वादो हि समस्तवस्तुतत्त्वसाधकमेकमस्खलितं शासनमर्हत्सर्वज्ञस्य स तु सर्वमनेकान्तात्मकमित्यनुशास्ति, सर्वस्यापि वस्तुनोऽनेकान्तस्वभावत्वात् अत्र त्वात्मवस्तुनि ज्ञानमात्रतया अनुशास्यमानेऽपि न तत्परिकोपः, ज्ञानमात्रस्यात्मवस्तुनः स्वयमेवानेकान्त- त्वात् तत्र यदेव तत्तदेवातत्, यदेवैकं तदेवानेकं, यदेव सत्तदेवासत्, यदेव नित्यं तदेवानित्यमित्येकवस्तुवस्तुत्वनिष्पादकपरस्परविरुद्धशक्तिद्वयप्रकाशनमनेकान्तः तत्स्वात्मवस्तुनो ज्ञानमात्रत्वेऽप्यन्तश्चकचकायमानज्ञानस्वरूपेण तत्त्वात्, बहिरुन्मिषदनन्तज्ञेयतापन्नस्वरूपाति- रिक्तपररूपेणातत्त्वात्, सहक्रमप्रवृत्तानन्तचिदंशसमुदयरूपाविभागद्रव्येणैकत्वात्, अविभागैक- द्रव्यव्याप्तसहक्रमप्रवृत्तानन्तचिदंशरूपपर्यायैरनेकत्वात्, स्वद्रव्यक्षेत्रकालभावभवनशक्तिस्वभाववत्त्वेन

स्याद्वाद समस्त वस्तुओना स्वरूपने साधनारुं, अर्हत् सर्वज्ञनुं एक अस्खलित (निर्बाध) शासन छे. ते (स्याद्वाद) ‘बधुं अनेकांतात्मक छे’ एम उपदेशे छे, कारण के समस्त वस्तु अनेकांत - स्वभाववाळी छे. (‘सर्व वस्तुओ अनेकांतस्वरूप छे’ एम जे स्याद्वाद कहे छे ते असत्यार्थ कल्पनाथी कहेतो नथी, परंतु जेवो वस्तुनो अनेकांत स्वभाव छे तेवो ज कहे छे.)

अहीं आत्मा नामनी वस्तुने ज्ञानमात्रपणे उपदेशवामां आवतां छतां पण स्याद्वादनो कोप नथी; कारण के ज्ञानमात्र आत्मवस्तुने स्वयमेव अनेकांतपणुं छे. त्यां (अनेकांतनुं एवुं स्वरूप छे के), जे (वस्तु) तत् छे ते ज अतत् छे, जे (वस्तु) एक छे ते ज अनेक छे, जे सत् छे ते ज असत् छे, जे नित्य छे ते ज अनित्य छेएम एक वस्तुमां वस्तुपणानी निपजावनारी परस्पर विरुद्ध बे शक्तिओनुं प्रकाशवुं ते अनेकांत छे. माटे पोतानी आत्मवस्तुने पण, ज्ञानमात्रपणुं होवा छतां, तत् - अतत्पणुं, एक - अनेकपणुं, सत् - असत्पणुं अने नित्य - अनित्यपणुं प्रकाशे ज छे; कारण केतेने (ज्ञानमात्र आत्मवस्तुने) अंतरंगमां चकचकाट प्रकाशता ज्ञानस्वरूप वडे तत्पणुं छे, अने बहार प्रगट थता, अनंत, ज्ञेयपणाने पामेला, स्वरूपथी भिन्न एवा पर रूप वडे (ज्ञानस्वरूपथी भिन्न एवा परद्रव्यना रूप वडे) अतत्पणुं छे (अर्थात् ते - रूपे ज्ञान नथी); सहभूत (साथे) प्रवर्तता अने क्रमे प्रवर्तता अनंत चैतन्य - अंशोना समुदायरूप अविभाग द्रव्य वडे एकपणुं छे, अने अविभाग एक द्रव्यथी व्याप्त, सहभूत प्रवर्तता अने क्रमे प्रवर्तता अनंत चैतन्य - अंशोरूप (चैतन्यना अनंत अंशोरूप) पर्यायो वडे अनेकपणुं छे; पोताना द्रव्य - क्षेत्र - काळ-भावरूपे होवानी शक्तिरूप जे स्वभाव ते स्वभाववानपणा वडे (अर्थात् एवा स्वभाववाळी होवाथी) सत्पणुं छे, अने

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