कहानजैनशास्त्रमाळा ]
ज्ज्ञेयाकारविशीर्णशक्तिरभितस्त्रुटयन्पशुर्नश्यति ।
न्नेकं ज्ञानमबाधितानुभवनं पश्यत्यनेकान्तवित् ।।२५०।।
रचायेलुं होवा छतां विश्वरूप नहि एवा (अर्थात् समस्त ज्ञेय वस्तुओना आकारे थवा छतां समस्त ज्ञेयवस्तुथी भिन्न एवा) [तस्य स्वतत्त्वं स्पृशेत्] पोताना निजतत्त्वने स्पर्शे छे — अनुभवे छे.
भावार्थः — एकांतवादी एम माने छे के — विश्व ( – समस्त वस्तुओ) ज्ञानरूप अर्थात् पोतारूप छे. आ रीते पोताने अने विश्वने अभिन्न मानीने, पोताने विश्वमय मानीने, एकांतवादी, ढोरनी जेम हेय-उपादेयना विवेक विना सर्वत्र स्वच्छंदपणे प्रवर्ते छे. स्याद्वादी तो एम माने छे के — जे वस्तु पोताना स्वरूपथी तत्स्वरूप छे, ते ज वस्तु परना स्वरूपथी अतत्स्वरूप छे; माटे ज्ञान पोताना स्वरूपथी तत्स्वरूप छे, परंतु पर ज्ञेयोना स्वरूपथी अतत्स्वरूप छे अर्थात् पर ज्ञेयोना आकारे थवा छतां तेमनाथी भिन्न छे.
आ प्रमाणे पररूपथी अतत्पणानो भंग कह्यो. २४९.
(हवे त्रीजा भंगना कळशरूपे काव्य कहेवामां आवे छेः — )
श्लोकार्थः — [पशुः] पशु अर्थात् सर्वथा एकांतवादी अज्ञानी, [बाह्य - अर्थ-ग्रहण - स्वभाव - भरतः] बाह्य पदार्थोने ग्रहण करवाना (ज्ञानना) स्वभावनी अतिशयताने लीधे, [विष्वग् - विचित्र - उल्लसत् - ज्ञेयाकार - विशीर्ण - शक्तिः] चारे तरफ (सर्वत्र) प्रगट थता अनेक प्रकारना ज्ञेयाकारोथी जेनी शक्ति विशीर्ण थई गई छे एवो थईने (अर्थात् अनेक ज्ञेयोना आकारो ज्ञानमां जणातां ज्ञाननी शक्तिने छिन्नभिन्न – खंडखंडरूप – थई जती मानीने) [अभितः त्रुटयन्] समस्तपणे तूटी जतो थको (अर्थात् खंडखंडरूप – अनेकरूप – थई जतो थको) [नश्यति] नाश पामे छे; [अनेकान्तवित्] अने अनेकांतनो जाणनार तो, [सदा अपि उदितया एक - द्रव्यतया] सदाय उदित ( – प्रकाशमान) एकद्रव्यपणाने लीधे [भेदभ्रमं ध्वंसयन्] भेदना भ्रमने नष्ट करतो थको (अर्थात् ज्ञेयोना भेदे ज्ञानमां सर्वथा भेद पडी जाय छे एवा भ्रमनो नाश करतो थको), [एकम् अबाधित - अनुभवनं ज्ञानम्] जे एक छे ( – सर्वथा अनेक नथी) अने जेनुं अनुभवन निर्बाध छे एवा ज्ञानने [पश्यति] देखे छे — अनुभवे छे.