कहानजैनशास्त्रमाळा ]
तुच्छीभूय पशुः प्रणश्यति चिदाकारान् सहार्थैर्वमन् ।
त्यक्तार्थोऽपि न तुच्छतामनुभवत्याकारकर्षी परान् ।।२५५।।
सीदत्येव न किञ्चनापि कलयन्नत्यन्ततुच्छः पशुः ।
पूर्णस्तिष्ठति बाह्यवस्तुषु मुहुर्भूत्वा विनश्यत्स्वपि ।।२५६।।
श्लोकार्थः — [पशुः] पशु अर्थात् सर्वथा एकांतवादी अज्ञानी, [स्वक्षेत्रस्थितये पृथग्विध - परक्षेत्र - स्थित - अर्थ - उज्झनात्] स्वक्षेत्रमां रहेवा माटे जुदा जुदा परक्षेत्रमां रहेला ज्ञेय पदार्थोने छोडवाथी, [अर्थैः सह चिद् - आकारान् वमन्] ज्ञेय पदार्थोनी साथे चैतन्यना आकारोने पण वमी नाखतो थको (अर्थात् ज्ञेय पदार्थोना निमित्ते चैतन्यमां जे आकारो थाय छे तेमने पण छोडी देतो थको) [तुच्छीभूय] तुच्छ थईने [प्रणश्यति] नाश पामे छे; [स्याद्वादी तु] अने स्याद्वादी तो [स्वधामनि वसन्] स्वक्षेत्रमां रहेतो, [परक्षेत्रे नास्तितां विदन्] परक्षेत्रमां पोतानुं नास्तित्व जाणतो थको, [त्यक्त - अर्थः अपि] (परक्षेत्रमां रहेला) ज्ञेय पदार्थोने छोडतां छतां [परान् आकारकर्षी] ते पर पदार्थोमांथी चैतन्यना आकारोने खेंचतो होवाथी (अर्थात् ज्ञेय पदार्थोना निमित्ते थता चैतन्यना आकारोने छोडतो नहि होवाथी) [तुच्छताम् अनुभवति न] तुच्छता पामतो नथी.
भावार्थः — ‘परक्षेत्रमां रहेला ज्ञेय पदार्थोना आकारे चैतन्यना आकारो थाय छे तेमने जो हुं पोताना करीश तो स्वक्षेत्रमां ज रहेवाने बदले परक्षेत्रमां पण व्यापी जईश’ एम मानीने अज्ञानी एकांतवादी परक्षेत्रमां रहेला ज्ञेय पदार्थोनी साथे साथे चैतन्यना आकारोने पण छोडी दे छे; ए रीते पोते चैतन्यना आकारो रहित तुच्छ थाय छे, नाश पामे छे. स्याद्वादी तो स्वक्षेत्रमां रहेतो, परक्षेत्रमां पोतानी नास्तिता जाणतो थको, ज्ञेय पदार्थोने छोडतां छतां चैतन्यना आकारोने छोडतो नथी; माटे ते तुच्छ थतो नथी, नाश पामतो नथी.
आ प्रमाणे परक्षेत्रनी अपेक्षाथी नास्तित्वनो भंग कह्यो. २५५. (हवे नवमा भंगना कळशरूपे काव्य कहेवामां आवे छेः — )
श्लोकार्थः — [पशुः] पशु अर्थात् एकांतवादी अज्ञानी, [पूर्व - आलम्बित - बोध्यनाश - समये