कहानजैनशास्त्रमाळा ]
वाञ्छत्युच्छलदच्छचित्परिणतेर्भिन्नं पशुः किञ्चन ।
स्याद्वादी तदनित्यतां परिमृशंश्चिद्वस्तुवृत्तिक्रमात् ।।२६१।।
अनित्य पर्यायो द्वारा आत्माने सर्वथा अनित्य मानतो थको, पोताने नष्ट करे छे; अने स्याद्वादी तो, जोके ज्ञान ज्ञेयो अनुसार ऊपजे - विणसे छे तोपण, चैतन्यभावनो नित्य उदय अनुभवतो थको जीवे छे — नाश पामतो नथी.
(हवे चौदमा भंगना कळशरूपे काव्य कहेवामां आवे छेः — )
श्लोकार्थः — [पशुः] पशु अर्थात् एकांतवादी अज्ञानी, [टङ्कोत्कीर्ण - विशुद्धबोध - विसर - आकार - आत्म - तत्त्व - आशया] टंकोत्कीर्ण विशुद्ध ज्ञानना फेलावरूप एक-आकार (सर्वथा नित्य) आत्मतत्त्वनी आशाथी, [उच्छलत् - अच्छ - चित्परिणतेः भिन्नं किञ्चन वाञ्छति] ऊछळती निर्मळ चैतन्यपरिणतिथी जुदुं कांईक (आत्मतत्त्वने) इच्छे छे (परंतु एवुं कोई आत्मतत्त्व छे नहि); [स्याद्वादी] अने स्याद्वादी तो, [चिद् - वस्तु - वृत्ति - क्रमात् तद् - अनित्यतां परिमृशन्] चैतन्यवस्तुनी वृत्तिना ( – परिणतिना, पर्यायना) क्रम द्वारा तेनी अनित्यताने अनुभवतो थको, [नित्यम् ज्ञानं अनित्यतापरिगमे अपि उज्ज्वलम् आसादयति] नित्य एवा ज्ञानने अनित्यताथी व्याप्त छतां उज्ज्वळ ( – निर्मळ) माने छे — अनुभवे छे.
भावार्थः — एकांतवादी ज्ञानने सर्वथा एकाकार – नित्य प्राप्त करवानी वांछाथी, ऊपजती - विणसती चैतन्यपरिणतिथी जुदुं कांईक ज्ञानने इच्छे छे; परंतु परिणाम सिवाय जुदो कोई परिणामी तो होतो नथी. स्याद्वादी तो एम माने छे के — जोके द्रव्ये ज्ञान नित्य छे तोपण क्रमशः ऊपजती - विणसती चैतन्यपरिणतिना क्रमने लीधे ज्ञान अनित्य पण छे; एवो ज वस्तुस्वभाव छे.
आ प्रमाणे अनित्यत्वनो भंग कह्यो. २६१. ‘पूर्वोक्त रीते अनेकांत, अज्ञानथी मूढ थयेला जीवोने ज्ञानमात्र आत्मतत्त्व प्रसिद्ध करी दे छे — समजावी दे छे’ एवा अर्थनुं काव्य हवे कहेवामां आवे छेः —