Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Kalash: 260 13.

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समयसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
(शार्दूलविक्रीडित)
प्रादुर्भावविराममुद्रितवहज्ज्ञानांशनानात्मना
निर्ज्ञानात्क्षणभङ्गसङ्गपतितः प्रायः पशुर्नश्यति
स्याद्वादी तु चिदात्मना परिमृशंश्चिद्वस्तु नित्योदितं
टङ्कोत्कीर्णघनस्वभावमहिम ज्ञानं भवन् जीवति
।।२६०।।

शुद्ध - स्वभाव - च्युतः] सर्व भावोरूप भवननो आत्मामां अध्यास करीने (अर्थात् सर्व ज्ञेय पदार्थोना भावोरूपे आत्मा छे एम मानीने) शुद्ध स्वभावथी च्युत थयो थको, [अनिवारितः सर्वत्र अपि स्वैरं गतभयः क्रीडति] कोई परभावने बाकी राख्या विना सर्व परभावोमां स्वच्छंदताथी निर्भयपणे (निःशंकपणे) क्रीडा करे छे; [स्याद्वादी तु] अने स्याद्वादी तो [स्वस्य स्वभावं भरात् आरूढः] पोताना स्वभावमां अत्यंत आरूढ थयो थको, [परभाव - भाव - विरह - व्यालोक - निष्कम्पितः] परभावोरूप भवनना अभावनी द्रष्टिने लीधे (अर्थात् आत्मा परद्रव्योना भावोरूपे नथीएम देखतो होवाथी) निष्कंप वर्ततो थको, [विशुद्धः एव लसति] शुद्ध ज विराजे छे.

भावार्थःएकांतवादी सर्व परभावोने पोतारूप जाणीने पोताना शुद्ध स्वभावथी च्युत थयो थको सर्वत्र (सर्व परभावोमां) स्वेच्छाचारीपणे निःशंक रीते वर्ते छे; अने स्याद्वादी तो, परभावोने जाणतां छतां, पोताना शुद्ध ज्ञानस्वभावने सर्व परभावोथी भिन्न अनुभवतो थको शोभे छे.

आ प्रमाणे परभाव - अपेक्षाथी नास्तित्वनो भंग कह्यो. २५९.

(हवे तेरमा भंगना कळशरूपे काव्य कहेवामां आवे छेः)

श्लोकार्थः[पशुः] पशु अर्थात् एकांतवादी अज्ञानी, [प्रादुर्भाव - विराम - मुद्रित - वहत् - ज्ञान - अंश - नाना - आत्मना निर्ज्ञानात्] उत्पाद - व्ययथी लक्षित एवा जे वहेता (परिणमता) ज्ञानना अंशो ते - रूप अनेकात्मकपणा वडे ज (आत्मानो) निर्णय अर्थात् ज्ञान करतो थको, [क्षणभङ्ग - सङ्ग - पतितः] *क्षणभंगना संगमां पडेलो, [प्रायः नश्यति] बाहुल्यपणे नाश पामे छे; [स्याद्वादी तु] अने स्याद्वादी तो [चिद् - आत्मना चिद् - वस्तु नित्य - उदितं परिमृशन्] चैतन्यात्मकपणा वडे चैतन्यवस्तुने नित्य - उदित अनुभवतो थको, [टङ्कोत्कीर्ण - घन - स्वभाव - महिम ज्ञानं भवन्] टंकोत्कीर्णघनस्वभाव (टंकोत्कीर्णपिंडरूप स्वभाव) जेनो महिमा छे एवा ज्ञानरूप वर्ततो, [जीवति] जीवे छे.

भावार्थःएकांतवादी ज्ञेयोना आकार अनुसार ज्ञानने ऊपजतुं - विणसतुं देखीने,

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* क्षणभंग = क्षणे क्षणे थतो नाश; क्षणभंगुरता; अनित्यता.