Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

परिशिष्ट
६०९

नन्वनेकान्तमयस्यापि किमर्थमत्रात्मनो ज्ञानमात्रतया व्यपदेशः ? लक्षणप्रसिद्धया लक्ष्यप्रसिद्धयर्थम् आत्मनो हि ज्ञानं लक्षणं, तदसाधारणगुणत्वात् तेन ज्ञानप्रसिद्धया तल्लक्ष्यस्यात्मनः प्रसिद्धिः ननु किमनया लक्षणप्रसिद्धया, लक्ष्यमेव प्रसाधनीयम् नाप्रसिद्धलक्षणस्य लक्ष्यप्रसिद्धिः, प्रसिद्धलक्षणस्यैव तत्प्रसिद्धेः ननु किं तल्लक्ष्यं यज्ज्ञानप्रसिद्धया ततो भिन्नं प्रसिध्यति ? न ज्ञानाद्भिन्नं लक्ष्यं, ज्ञानात्मनोर्द्रव्यत्वेनाभेदात् तर्हि किं कृतो लक्ष्यलक्षणविभागः ? प्रसिद्धप्रसाध्यमानत्वात् कृतः प्रसिद्धं हि ज्ञानं, ज्ञानमात्रस्य


सारी रीते विचार करी प्रत्यक्ष अनुमान - प्रमाणथी अनुभव करी जुओ. २६३.

(आचार्यदेव अनेकांतने हजु विशेष चर्चे छेः)

(प्रश्नः) आत्मा अनेकांतमय होवा छतां पण अहीं तेनो ज्ञानमात्रपणे केम कहेवामां आवे छे? ज्ञानमात्र कहेवाथी तो अन्य धर्मोनो निषेध समजाय छे.)

(उत्तरः) लक्षणनी प्रसिद्धि वडे लक्ष्यनी प्रसिद्धि करवा माटे आत्मानो ज्ञानमात्रपणे व्यपदेश करवामां आवे छे. आत्मानुं ज्ञान लक्षण छे, कारण के ज्ञान आत्मानो असाधारण गुण छे (अन्य द्रव्योमां ज्ञानगुण नथी). माटे ज्ञाननी प्रसिद्धि वडे तेना लक्ष्यनीआत्मानी प्रसिद्धि थाय छे.

(प्रश्नः) ए लक्षणनी प्रसिद्धिथी शुं प्रयोजन छे? मात्र लक्ष्य ज प्रसाध्य अर्थात् प्रसिद्ध करवायोग्य छे. (माटे लक्षणने प्रसिद्ध कर्या विना मात्र लक्ष्यने जआत्माने ज प्रसिद्ध केम करता नथी?)

(उत्तरः) जेने लक्षण अप्रसिद्ध होय तेने (अर्थात् जे लक्षणने जाणतो नथी एवा अज्ञानी जनने) लक्ष्यनी प्रसिद्धि थती नथी. जेने लक्षण प्रसिद्ध थाय तेने ज लक्ष्यनी प्रसिद्धि थाय छे. (माटे अज्ञानीने पहेलां लक्षण बतावीए त्यारे ते लक्ष्यने ग्रहण करी शके छे.)

(प्रश्नः) कयुं ते लक्ष्य छे के जे ज्ञाननी प्रसिद्धि वडे तेनाथी (ज्ञानथी) भिन्न प्रसिद्ध थाय छे?

(उत्तरः) ज्ञानथी भिन्न लक्ष्य नथी, कारण के ज्ञान अने आत्माने द्रव्यपणे अभेद छे.

(प्रश्नः) तो पछी लक्षण अने लक्ष्यनो विभाग शा माटे करवामां आव्यो?

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*व्यपदेश करवामां आवे छे? (आत्मा अनंत धर्मोवाळो होवा छतां तेने ज्ञानमात्रपणे केम

* व्यपदेश = कथन; नाम.