Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). 47 shaktis of atma quote 1.

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समयसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-

स्वसंवेदनसिद्धत्वात्ः तेन प्रसिद्धेन प्रसाध्यमानस्तदविनाभूतानन्तधर्मसमुदयमूर्तिरात्मा ततो ज्ञानमात्राचलितनिखातया द्रष्टया क्रमाक्रमप्रवृत्तं तदविनाभूतं अनन्तधर्मजातं यद्यावल्लक्ष्यते तत्तावत्समस्तमेवैकः खल्वात्मा एतदर्थमेवात्रास्य ज्ञानमात्रतया व्यपदेशः ननु क्रमाक्रमप्रवृत्तानन्तधर्ममयस्यात्मनः कथं ज्ञानमात्रत्वम् ? परस्परव्यतिरिक्तानन्तधर्मसमुदाय- परिणतैकज्ञप्तिमात्रभावरूपेण स्वयमेव भवनात् अत एवास्य ज्ञानमात्रैकभावान्तःपातिन्योऽनन्ताः

(उत्तरः) प्रसिद्धत्व अने *प्रसाध्यमानत्वने लीधे लक्षण अने लक्ष्यनो विभाग करवामां आव्यो छे. ज्ञान प्रसिद्ध छे, कारण के ज्ञानमात्रने स्वसंवेदनथी सिद्धपणुं छे (अर्थात् ज्ञान सर्व प्राणीओने स्वसंवेदनरूप अनुभवमां आवे छे); ते प्रसिद्ध एवा ज्ञान वडे प्रसाध्यमान, तद् - अविनाभूत (ज्ञाननी साथे अविनाभावी संबंधवाळा) अनंत धर्मोना समुदायरूप मूर्ति आत्मा छे. (ज्ञान प्रसिद्ध छे; अने ज्ञान साथे जेमनो अविनाभावी संबंध छे एवा अनंत धर्मोना समुदायस्वरूप आत्मा ते ज्ञान वडे प्रसाध्यमान छे.) माटे ज्ञानमात्रमां अचलितपणे स्थापेली द्रष्टि वडे, क्रमरूप अने अक्रमरूप प्रवर्ततो, तद् - अविनाभूत (ज्ञाननी साथे अविनाभावी संबंधवाळो) अनंतधर्मसमूह जे कांई जेवडो लक्षित थाय छे, ते सघळोय खरेखर एक आत्मा छे.

आ कारणे ज अहीं आत्मानो ज्ञानमात्रपणे व्यपदेश छे. (प्रश्नः) जेमां क्रम अने अक्रमे प्रवर्तता अनंत धर्मो छे एवा आत्माने ज्ञानमात्रपणुं कई रीते छे?

(उत्तरः) परस्पर भिन्न एवा अनंत धर्मोना समुदायरूपे परिणत एक ज्ञप्तिमात्र भावरूपे पोते ज होवाथी (अर्थात् परस्पर भिन्न एवा अनंत धर्मोना समुदायरूपे परिणमेली जे एक जाणनक्रिया ते जाणनक्रियामात्र भावरूपे पोते ज होवाथी) आत्माने ज्ञानमात्रपणुं छे. माटे ज तेने ज्ञानमात्र एक भावनी अंतःपातिनी (ज्ञानमात्र एक भावनी अंदर पडनारी अर्थात् ज्ञानमात्र एक भावनी अंदर आवी जती) अनंत शक्तिओ ऊछळे छे. (आत्माना जेटला धर्मो छे ते बधायने, लक्षणभेदे भेद होवा छतां, प्रदेशभेद नथी; आत्माना एक परिणाममां बधाय धर्मोनुं परिणमन रहेलुं छे. तेथी आत्माना एक ज्ञानमात्र भावनी अंदर अनंत शक्तिओ रहेली छे. माटे ज्ञानमात्र भावमांज्ञानमात्र भावस्वरूप आत्मामांअनंत शक्तिओ ऊछळे छे.) तेमांनी केटलीक शक्तिओ नीचे प्रमाणे छेःआत्मद्रव्यने कारणभूत एवा चैतन्यमात्र भावनुं धारण जेनुं लक्षण अर्थात् स्वरूप छे एवी जीवत्वशक्ति. (आत्मद्रव्यने

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* प्रसाध्यमान = प्रसिद्ध करवामां आवतुं होय ते. (ज्ञान प्रसिद्ध छे अने आत्मा प्रसाध्यमान छे.)