कहानजैनशास्त्रमाळा ]
शुद्धप्रकाशभरनिर्भरसुप्रभातः ।
स्तस्यैव चायमुदयत्यचलार्चिरात्मा ।।२६८।।
तथा (रागादिक अशुद्ध परिणतिना त्यागरूप) सुनिश्चळ संयम — ए बन्ने वडे [इह उपयुक्तः] पोतामां उपयुक्त रहेतो थको (अर्थात् पोताना ज्ञानस्वरूप आत्मामां उपयोगने जोडतो थको) [अहः अहः स्वम् भावयति] प्रतिदिन पोताने भावे छे ( – निरंतर पोताना आत्मानी भावना करे छे), [सः एकः] ते ज एक (पुरुष), [ज्ञान - क्रिया - नय - परस्पर - तीव्र - मैत्री - पात्रीकृतः] ज्ञाननय अने क्रियानयनी परस्पर तीव्र मैत्रीना पात्ररूप थयेलो, [इमाम् भूमिम् श्रयति] आ (ज्ञानमात्र निजभावमय) भूमिकानो आश्रय करे छे.
भावार्थः — जे ज्ञाननयने ज ग्रहीने क्रियानयने छोडे छे, ते प्रमादी अने स्वच्छंदी पुरुषने आ भूमिकानी प्राप्ति थई नथी. जे क्रियानयने ज ग्रहीने ज्ञाननयने जाणतो नथी, ते (व्रत - समिति - गुप्तिरूप) शुभ कर्मथी संतुष्ट पुरुषने पण आ निष्कर्म भूमिकानी प्राप्ति थई नथी. जे पुरुष अनेकांतमय आत्माने जाणे छे ( – अनुभवे छे) तथा सुनिश्चळ संयममां वर्ते छे ( – रागादिक अशुद्ध परिणतिनो त्याग करे छे), ए रीते जेणे ज्ञाननय अने क्रियानयनी परस्पर तीव्र मैत्री साधी छे, ते ज पुरुष आ ज्ञानमात्र निजभावमयी भूमिकानो आश्रय करनार छे.
ज्ञाननय अने क्रियानयना ग्रहण - त्यागनुं स्वरूप अने फळ ‘पंचास्तिकायसंग्रह’ शास्त्रना अंतमां कह्युं छे, त्यांथी जाणवुं. २६७.
आम जे पुरुष आ भूमिकानो आश्रय करे छे, ते ज अनंत चतुष्टयमय आत्माने पामे छे — एवा अर्थनुं काव्य हवे कहे छेः —
श्लोकार्थः — [तस्य एव] (पूर्वोक्त रीते जे पुरुष आ भूमिकानो आश्रय करे छे) तेने ज, [चित् - पिण्ड - चण्डिम - विलासि - विकास - हासः] चैतन्यपिंडनो निरर्गळ विलसतो जे विकास ते - रूप जेनुं खीलवुं छे (अर्थात् चैतन्यपुंजनो जे अत्यंत विकास थवो ते ज जेनुं खीली नीकळवुं छे), [शुद्ध - प्रकाश - भर - निर्भर - सुप्रभातः] शुद्ध प्रकाशनी अतिशयताने लीधे जे सुप्रभात समान छे, [आनन्द - सुस्थित - सदा - अस्खलित - एक - रूपः] आनंदमां सुस्थित एवुं जेनुं सदा अस्खलित एक रूप छे [च] अने [अचल - अर्चिः] अचळ जेनी ज्योत छे एवो [अयम् आत्मा उदयति] आ आत्मा उदय पामे छे.