Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Kalash: 266-267.

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समयसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-

पररूपेण भवनं पश्यन्तो जानन्तोऽनुचरन्तश्च मिथ्याद्रष्टयो मिथ्याज्ञानिनो मिथ्याचारित्राश्च भवन्तोऽत्यन्तमुपायोपेयभ्रष्टा विभ्रमन्त्येव

(वसन्ततिलका)
ये ज्ञानमात्रनिजभावमयीमकम्पां
भूमिं श्रयन्ति कथमप्यपनीतमोहाः
ते साधकत्वमधिगम्य भवन्ति सिद्धा
मूढास्त्वमूमनुपलभ्य परिभ्रमन्ति
।।२६६।।
(वसन्ततिलका)
स्याद्वादकौशलसुनिश्चलसंयमाभ्यां
यो भावयत्यहरहः स्वमिहोपयुक्तः
ज्ञानक्रियानयपरस्परतीव्रमैत्री-
पात्रीकृतः श्रयति भूमिमिमां स एकः
।।२६७।।

मिथ्याचारित्री वर्तता थका, उपाय - उपेयभावथी अत्यंत भ्रष्ट वर्तता थका संसारमां परिभ्रमण ज करे छे.

हवे आ अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः

श्लोकार्थः[ये] जे पुरुषो, [कथम् अपि अपनीत - मोहाः] कोई पण प्रकारे जेमनो मोह दूर थयो छे एवा थया थका, [ज्ञानमात्र - निज - भावमयीम् अकम्पां भूमिं] ज्ञानमात्र निजभावमय अकंप भूमिकानो (अर्थात् ज्ञानमात्र जे पोतानो भाव ते - मय निश्चळ भूमिकानो) [श्रयन्ति] आश्रय करे छे, [ते साधकत्वम् अधिगम्य सिद्धाः भवन्ति] तेओ साधकपणाने पामीने सिद्ध थाय छे; [तु] परंतु [मूढाः] जेओ मूढ (मोही, अज्ञानी, मिथ्याद्रष्टि) छे, तेओ [अमूम् अनुपलभ्य] आ भूमिकाने नहि पामीने [परिभ्रमन्ति] संसारमां परिभ्रमण करे छे.

भावार्थःजे भव्य पुरुषो, गुरुना उपदेशथी अथवा स्वयमेव काळलब्धिने पामी मिथ्यात्वथी रहित थईने, ज्ञानमात्र एवा पोताना स्वरूपने पामे छे, तेनो आश्रय करे छे, तेओ साधक थया थका सिद्ध थाय छे; परंतु जेओ ज्ञानमात्र एवा पोताने पामता नथी, तेओ संसारमां रखडे छे. २६६.

आ भूमिकानो आश्रय करनार जीव केवो होय ते हवे कहे छेः

श्लोकार्थः[यः] जे पुरुष [स्याद्वाद - कौशल - सुनिश्चल - संयमाभ्यां] स्याद्वादमां प्रवीणता

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