कहानजैनशास्त्रमाळा ]
रत्नत्रयातिशयप्रवृत्तसकलकर्मक्षयप्रज्वलितास्खलितविमलस्वभावभावतया सिद्धरूपेण च स्वयं परिणममानं ज्ञानमात्रमेकमेवोपायोपेयभावं साधयति । एवमुभयत्रापि ज्ञानमात्रस्यानन्यतया नित्यमस्खलितैकवस्तुनो निष्कम्पपरिग्रहणात् तत्क्षण एव मुमुक्षूणामासंसारादलब्धभूमिकानामपि भवति भूमिकालाभः । ततस्तत्र नित्यदुर्ललितास्ते स्वत एव क्रमाक्रमप्रवृत्तानेकान्तमूर्तयः साधकभावसम्भवपरमप्रकर्षकोटिसिद्धिभावभाजनं भवन्ति । ये तु नेमामन्तर्नीतानेकान्त-
ज्ञानमात्रैकभावरूपां भूमिमुपलभन्ते ते नित्यमज्ञानिनो भवन्तो ज्ञानमात्रभावस्य स्वरूपेणाभवनं
परिणमतुं, तथा परम प्रकर्षनी हदने पामेला रत्नत्रयनी अतिशयताथी प्रवर्तेलो जे सकळ कर्मनो क्षय तेनाथी प्रज्वलित (देदीप्यमान) थयेलो जे अस्खलित विमळ स्वभावभाव ते - पणा वडे पोते सिद्ध रूपे परिणमतुं एवुं एक ज ज्ञानमात्र उपाय - उपेयभाव साधे छे.
(भावार्थः — आ आत्मा अनादि काळथी मिथ्यादर्शनज्ञानचारित्रने लीधे संसारमां भमे छे. ते सुनिश्चळपणे ग्रहण करेलां व्यवहारसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रनी वृद्धिनी परंपरा वडे अनुक्रमे स्वरूपनो अनुभव ज्यारथी करे त्यारथी ज्ञान साधक रूपे परिणमे छे, कारण के ज्ञानमां निश्चयसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्ररूप भेदो अंतर्भूत छे. निश्चयसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रनी शरूआतथी मांडीने, स्वरूप - अनुभवनी वृद्धि करतां करतां ज्यां सुधी निश्चयसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रनी पूर्णता न थाय, त्यां सुधी ज्ञाननुं साधक रूपे परिणमन छे. ज्यारे निश्चयसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रनी पूर्णताथी समस्त कर्मनो नाश थाय अर्थात् साक्षात् मोक्ष थाय त्यारे ज्ञान सिद्ध रूपे परिणमे छे, कारण के तेनो अस्खलित निर्मळ स्वभावभाव प्रगट देदीप्यमान थयो छे. आ रीते साधक रूपे अने सिद्ध रूपे — बन्ने रूपे परिणमतुं एक ज ज्ञान आत्मवस्तुने उपाय - उपेयपणुं साधे छे.)
आ रीते बन्नेमां ( – उपायमां तेम ज उपेयमां – ) ज्ञानमात्रनुं अनन्यपणुं छे अर्थात् अन्यपणुं नथी; माटे सदाय अस्खलित एक वस्तुनुं ( – ज्ञानमात्र आत्मवस्तुनुं – ) निष्कंप ग्रहण करवाथी, मुमुक्षुओने के जेमने अनादि संसारथी भूमिकानी प्राप्ति न थई होय तेमने पण, तत्क्षण ज भूमिकानी प्राप्ति थाय छे; पछी तेमां ज नित्य मस्ती करता ते मुमुक्षुओ — के जेओ पोताथी ज, क्रमरूप अने अक्रमरूप प्रवर्तता अनेक अंतनी (अनेक धर्मनी) मूर्तिओ छे तेओ — साधकभावथी उत्पन्न थती परम प्रकर्षनी *कोटिरूप सिद्धिभावनुं भाजन थाय छे. परंतु जेमां अनेक अंत अर्थात् धर्म गर्भित छे एवा एक ज्ञानमात्र भावरूप आ भूमिने जेओ प्राप्त करता नथी, तेओ सदा अज्ञानी वर्तता थका, ज्ञानमात्र भावनुं स्वरूपथी अभवन अने पररूपथी भवन देखता ( – श्रद्धता) थका, जाणता थका अने आचरता थका, मिथ्याद्रष्टि, मिथ्याज्ञानी अने
* कोटि = अंतिमता; उत्कृष्टता; ऊंचामां ऊंचुं बिंदु; हद.