नेव क्षपयामीत्यात्मनि निश्चित्य चिरसंगृहीतमुक्तपोतपात्रः समुद्रावर्त इव झगित्येवोद्वान्तसमस्त-
विकल्पोऽकल्पितमचलितममलमात्मानमालम्बमानो विज्ञानघनभूतः खल्वयमात्मास्रवेभ्यो निवर्तते ।
जीवणिबद्धा एदे अधुव अणिच्चा तहा असरणा य ।
समस्त परद्रव्यप्रवृत्तिसे निवृत्ति द्वारा इसी आत्मस्वभावमें निश्चल रहता हुआ, समस्त परद्रव्यके निमित्तसे विशेषरूप चेतनमें होनेवाले चञ्चल कल्लोलोंके निरोधसे इसको ही (इस चैतन्यस्वरूपको ही) अनुभव करता हुआ, अपने अज्ञानसे आत्मामें उत्पन्न होनेवाले जो यह क्रोधादिक भाव हैं उन सबका क्षय करता हूँ — ऐसा आत्मामें निश्चय करके, जिसने बहुत समयसे पकड़े हुए जहाजको छोड़ दिया है ऐसे समुद्रके भँवरकी भाँति, जिसने सर्व विकल्पोंको शीघ्र ही वमन कर दिया है ऐसा, निर्विकल्प अचलित निर्मल आत्माका अवलम्बन करता हुआ, विज्ञानघन होता हुआ, यह आत्मा आस्रवोंसे निवृत्त होता है ।
भावार्थ : — शुद्धनयसे ज्ञानीने आत्माका ऐसा निश्चय किया है कि — ‘मैं एक हूँ, शुद्ध हूँ, परद्रव्यके प्रति ममतारहित हूँ, ज्ञानदर्शनसे पूर्ण वस्तु हूँ’ । जब वह ज्ञानी आत्मा ऐसे अपने स्वरूपमें रहता हुआ उसीके अनुभवरूप हो तब क्रोधादिक आस्रव क्षयको प्राप्त होते हैं । जैसे समुद्रके आवर्त्त(भँवर)ने बहुत समयसे जहाजको पकड़ रखा हो और जब वह आवर्त्त शमन हो जाता है तब वह उस जहाजको छोड़ देता है, इसीप्रकार आत्मा विकल्पोंके आवर्त्तको शमन करता हुआ आस्रवोंको छोड़ देता है ।।७३।।
अब प्रश्न करता है कि ज्ञान होनेका और आस्रवोंकी निवृत्तिका समकाल (एक काल) कैसे है ? उसके उत्तररूप गाथा कहते हैं : —
ये दुःख, दुःखफल जानके इनसे निवर्तन जीव करे ।।७४।।
गाथार्थ : — [एते ] यह आस्रव [जीवनिबद्धाः ] जीवके साथ निबद्ध हैं, [अध्रुवाः ]
१३८