भावार्थ : — भेदज्ञान होनेके बाद, जीव और पुद्गलको कर्ताकर्मभाव है ऐसी बुद्धि नहींरहती; क्योंकि जब तक भेदज्ञान नहीं होता तब तक अज्ञानसे कर्ताकर्मभावकी बुद्धि होती है ।
यद्यपि जीवके परिणामको और पुद्गलके परिणामको अन्योन्य (परस्पर) निमित्तमात्रता हैतथापि उन (दोनों)को कर्ताकर्मपना नहीं है ऐसा अब कहते हैं : —
जीवभावहेतु पाय पुद्गल कर्मरूप जु परिणमे ।
पुद्गलकरमके निमित्तसे यह जीव भी त्यों परिणमे ।।८०।।