ज्ञानी कर्ममध्यगतोऽपि कर्मणा न लिप्यते, सर्वपरद्रव्यकृतरागत्यागशीलत्वे सति तदलेप- स्वभावत्वात् । यथा लोहं कर्दममध्यगतं सत्कर्दमेन लिप्यते, तल्लेपस्वभावत्वात्, तथा किलाज्ञानी कर्ममध्यगतः सन् कर्मणा लिप्यते, सर्वपरद्रव्यकृतरागोपादानशीलत्वे सति तल्लेपस्वभावत्वात् ।
ज्ञानिन् भुंक्ष्व परापराधजनितो नास्तीह बन्धस्तव ।।१५०।।
होता, (अर्थात् उसे जंग नहीं लगती) क्योंकि उसका स्वभाव कीचड़से अलिप्त रहना है, इसीप्रकार वास्तवमें ज्ञानी कर्मके मध्य रहा हुआ हो तथापि वह कर्मसे लिप्त नहीं होता, क्योंकि सर्व परद्रव्यके प्रति किये जानेवाला राग उसका त्यागरूप स्वभावपना होनेसे ज्ञानी कर्मसे अलिप्त रहनेके स्वभाववाला है । जैसे कीचड़के बीच पड़ा हुआ लोहा कीचड़से लिप्त हो जाता है, (अर्थात् उसमें जंग लग जाती है) क्योंकि उसका स्वभाव कीचड़से लिप्त होना है, इसीप्रकार वास्तवमें अज्ञानी कर्मके मध्य रहा हुआ कर्मसे लिप्त हो जाता है, क्योंकि सर्व परद्रव्यके प्रति किये जानेवाला राग उसका ग्रहणरूप स्वभावपना होनेसे अज्ञानी कर्मसे लिप्त होनेके स्वभाववाला है ।
भावार्थ : — जैसे कीचड़में पड़े हुए सोनेको जंग नहीं लगती और लोहेको लग जाती है, उसीप्रकार कर्मके मध्य रहा हुआ ज्ञानी कर्मसे नहीं बँधता तथा अज्ञानी बँध जाता है । यह ज्ञान -अज्ञानकी महिमा है ।।२१८-२१९।।
अब इस अर्थका और आगामी कथनका सूचक कलशरूप काव्य कहते हैं : —
श्लोकार्थ : — [इह ] इस लोक में [यस्य याद्रक् यः हि स्वभावः ताद्रक् तस्य वशतः अस्ति ] जिस वस्तुका जैसा स्वभाव होता है उसका वैसा स्वभाव उस वस्तुके अपने वशसे ही (अपने आधीन ही) होता है । [एषः ] ऐसा वस्तुका जो स्वभाव वह, [परैः ] परवस्तुओंके द्वारा [कथंचन अपि हि ] किसी भी प्रकारसे [अन्याद्रशः ] अन्य जैसा [कर्तुं न शक्यते ] नहीं किया जा सकता । [हि ] इसलिये [सन्ततं ज्ञानं भवत् ] जो निरन्तर ज्ञानरूप परिणमित होता है वह [कदाचन अपि अज्ञानं न भवेत् ] क भी भी अज्ञान नहीं होता; [ज्ञानिन् ] इसलिये हे ज्ञानी ! [भुंक्ष्व ] तू (क र्मोदयजनित) उपभोगको भोग, [इह ] इस जगतमें [पर-अपराध-जनितः बन्धः तव नास्ति ] परके अपराधसे उत्पन्न होनेवाला बन्ध तुझे नहीं है (अर्थात् परके अपराधसे तुझे बन्ध नहीं होता) ।
भावार्थ : — वस्तुका स्वभाव वस्तुके अपने आधीन ही है । इसलिये जो आत्मा स्वयं
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