केहिंचि दु पज्जएहिं विणस्सए णेव केहिंचि दु जीवो । जम्हा तम्हा कुव्वदि सो वा अण्णो व णेयंतो ।।३४५।। केहिंचि दु पज्जएहिं विणस्सए णेव केहिंचि दु जीवो । जम्हा तम्हा वेददि सो वा अण्णो व णेयंतो ।।३४६।। जो चेव कुणदि सो चिय ण वेदए जस्स एस सिद्धंतो । सो जीवो णादव्वो मिच्छादिट्ठी अणारिहदो ।।३४७।। अण्णो करेदि अण्णो परिभुंजदि जस्स एस सिद्धंतो ।
भावार्थ : — द्रव्यकी पर्यायें प्रतिक्षण नष्ट होती हैं, इसलिये बौद्ध यह मानते हैं कि ‘द्रव्य ही सर्वथा नष्ट होता है’ । ऐसी एकान्त मान्यता मिथ्या है । यदि पर्यायवान पदार्थका ही नाश हो जाये तो पर्याय किसके आश्रयसे होगी ? इसप्रकार दोनोंके नाशका प्रसंग आनेसे शून्यका प्रसंग आता है ।२०७।
अब, निम्नलिखित गाथाओंमें अनेकान्तको प्रगट करके क्षणिकवादका स्पष्टतया निषेध करते हैं : —
गाथार्थ : — [यस्मात् ] क्योंकि [जीवः ] जीव [कैश्चित् पर्यायैः तु ] कितनी ही