( दीपकला छंद )
जय बाहु जिनेश्वर जगतराय, सुग्रीव पिता विजया सुमाय;
राजे मृग लक्षन शोभमान, शुचि जन्म सुसीमानगर थान. १
श्रम सलिल रहित कलिमल सुनांहि, वर रुधिर छीर रंग अंगमांही;
सम चतुर लसे संस्थान सार, शुचि प्रथम सार संहनन सुधार. २
जितमार रूप राजें अपार, तन गंध जई सब गंध सार;
सब शुभ लक्षण मंडित सुजान, बल अतुल अंग धारत महान. ३
हितमित वर वचन सुधा समान, ये दश अतिशय धारत महान;
पुनि तपबल केवलज्ञान होत, तब दश अतिशय अद्भुत उद्योत. ४
चहुंधा शतशत योजन सुभिक्ष, नभगमन जु वध नहिं जीव अक्ष;
उपसर्ग रहित वर्जित अहार, दरशें चहुंधा आनन सुचार. ५
विद्या अशेष ईश्वर जिनंद, बिन छांह फटिक द्युति तन अमंद;
नहीं पलक-पतन नैनन-मझार, नख केश बढे नांही लगार. ६
चौदह सुरकृत राजें अनूप, तिन संयुत सोहे जगत भूप;
भाषा सू अर्ध मागधि अनूप, सब जीव मित्रता भाव रूप. ७
षट ॠतु फल फूल फले सदीव, दरपन सम अवनि लसे अतीव;
सब जीव परम आनंदरूप, योजन भुवि सुर मज्जें अनूप. ८
सुरमेघ करें जलगंध वृष्टि, पद तर सरदग भुजकंज सृष्टि;
भुविमंडल सोहे शशिस्वरूप, निरमल नभ अरुं दशदिश अनूप. ९
भजनमाळा ][ १५७