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श्री सुबाहुजिन – स्तवन
( दोहा )
अजय जयी अजयी सु अज, भव अज भय-हरतार,
रहित कर्मरज कुजदलन, जय सुबाहु बलधार.
( छंद )
जय जिनदेव सुबाहुवरं, केवल भानु प्रभानिकरं;
है निशढिल्ल नरेश पिता, मात सुनंदा शोभयुता. १
पावन जन्मपुरी अवधि, है भव ज्ञान त्रियुक्त सुधी;
चिह्न लसे कपिको ध्वजमें, इन्द्र नमें पद पंकज में. २
वैन सुधासम है सुथरे, सो गन ईश प्रकाश करें;
मोह महाभ्रम नाशन है, तत्त्व सु सात प्रकाशन है. ३
जीव भन्यो उपयोग मई, और अजीव जु है जडई;
आस्रव है पर प्रीतिहिसें, सो रस दायक बंध बसें. ४
संवर आस्रव रोक लसें, दे रस कर्म द्विभांति नसें;
सो यह निर्जर भाव लसें, है सुखदा जुत संवरसें. ५
मोक्ष सुबंधन मोक्ष करें, ये शिवदाय प्रतीत धरें;
क्षेत्र त्रिलोक अनादि लसें, कारक धारक नांहि इसें. ६
ना हरता कोउ है जु इसे, ते ध्रुव और उपजे विनसे;
ये सत लक्षण मंडित हैं, भाखत यों शत पंडित हैं. ७
भजनमाळा ][ १५९