जीव भन्यो उपयोग जुई, पुद्गल है गुन चार मई;
गंध स्पर्श रु वर्ण धरें, औ रसरूप मिलें – बिछूरे. ८
गमन सहायक धर्म गिनें, स्थान सहाय अधर्म भनें;
है अवकाश अकाश सही, जो वरतावन काल कही. ९
क्षेत्र रु काल जु भावनकी, होत लहाय जसी जिनकी;
ता समही सब रूप लसें, सो सब देव तुम्हें दरसे. १०
देख इन्हें निजरूप गहें, सो तब ही सुखसिंधु लहे;
है परप्रीति नहीं उरमें, नाहीं तहां सुख है धूरमें. ११
तो शरना इह हेत गही, हो हमकुं सरधा जु यही;
मो मन तो पदकंज धरो, भो जगपाल निहाल करो. १२
ये रसना मुखमें जु रहे, तौ लग तो गुनगान चहे;
प्रीति हटें परतें हमरी, चित्त बसे छबि या तुमरी. १३
औगुनको न हिये धरिये, दीन निहारी दया करिये;
‘‘थान’’ ग्रही शरना तुमरी, व्याधि हरो जिनजी हमरी. १४
( निशपालिका छंद )
रूप निज भालिकर भालि अति तीक्षनी,
ध्यान धनु साधि करि सैन्य विधिकी हनी;
देव वर बाहु पद कंज जन जो यजे,
ठोकी भुजदंड अरिमोह जय सों सजें.
१६० ][ श्री जिनेन्द्र