( अडिल्ल )
चरन सरोज सुबाहु तने जन जो यजें,
तजें अविद्याभाव स्वानुभवको भजें;
पुत्र पौत्र धनधान्य सौख्य इह भव लहें,
पर भव वरपद भोगी मुक्ति पदवी ग्रहें.
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श्री संजातक जिन – स्तवन
( छप्पय छंद )
जितदुराश दिगवास आश शिववास जास उर,
चिद विलास सुविकास अमित गुनराशि ज्ञान पर.
वर विभूति परकास दास सुरपति सब सेवें,
धरन ध्यान तप राशि नाशि भ्रम निजगुन लेवें.
बल अतुलराशि अरि त्रास करि, असमशक्ति संजात धर,
करुना प्रकाशि निज दास पैं, सुख विकासी अघ नाश कर.
( दीपकला छंद )
संजातक सुनि मेरी पुकार, विधिवश मैं दुःख भुगते अपार;
वर भाग्य उदय तुम वचन द्वार, यह जान परी हमकुं अबार. १
विधि बंधनकारण पांच एव, तिनमें मिथ्यात जु पंचमेव;
सो प्रथम नाम एकांत जास, जिस बल नहीं पूरन वस्तु भास. २
भजनमाळा ][ १६१