विपरीत नाम दूजो विरूप, दरसात औरसें और रूप;
तीजो सु विनय नामा कुभाव, जिस बल श्रद्धा चंचल लखाव. ३
संशय चतुर्थ जानो अहेत, सो सत्य प्रतीत न होन देत;
पंचम अज्ञान विशेष जानि, जिस बल न सकें निजगुण पिछानी. ४
पुनि अविरत विरत स्वभाव हीन, परमाद अक्षवश स्नेहलीन;
कसि है जु कषाय सु करत क्षोभ, यह क्रोध मान माया रू लोभ. ५
उपहास्य अरति रति शोक जानि, भय जुगुप्सा रू त्रय वेद मानि;
चल तन मन वचन सुयोग तीन, ये बंधनकारन लिए चीन. ६
सो बंध चतुर्विध है सुजान, पहले प्रकृति सु सुभाव मान;
थितिबंध करे थितिको विथार, अनुभाग तृतीय रस देनहार. ७
आतम प्रदेश परचय सुजानि, सो बंध प्रदेश चतुर्थ मानि;
करि भूलि वसें वसु भांति येह, परिवर्तन काल किये अछेह. ८
दुःख भुगते सो कहि सकत नाहि, सब झलकि रहे तुम ज्ञानमांहि;
वर मात देवसेना विख्यात, नृप देवसेन पितु विमल गात. ९
अलकापुर पावन जन्म थान, युत सूर्य-चिह्न राजत निशान;
वर धर्मचक्र धारत जगीश, तुम गुन नहि बरन सकें फणीश. १०
तुम दीन दयाल कहात देव, यातें हम शरन गही स्वमेव;
विधिबंध योग्य दुरभाव हानि, करि क्षायिकभाव कृपा निधान. ११
यह जाचत हूं कर जोडि देव, भवभव पाउं तुव चरन सेव;
तुव वचन सुधारस पान सार, ये ‘‘थान’’ चहे भवभव-मझार. १२
१६२ ][ श्री जिनेन्द्र