( धत्ता छंद )
जय चिदवर वरछबि मोह अचल पवि, चारित धर धर धरनिधर,
संभ्रमतपहर अवि तन-द्युतिजितरवि, संजातक जिन श्रेयकरं.
( अडिल्ल छंद )
संजातक जिन सेव करत कर जोरिकें,
जानत भवि निजजाति नेह पर मोरिकें;
प्रकट होत सुख अघट सुघटमें ता घरी,
पूजें मनकी आश वास ह्वै निजपुरी.
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[६]
श्री स्वयंप्रभ जिन – स्तवन
( दोहा )
जन्मथान विजयापुरी, जयो मंगलानंद;
सुहृदमित्र नृप तात जसु, लसे चिन्ह ध्वज चंद.
जास गिरा पावन गदा, हरन मोह दुरयोध;
पावन पावन उर धरूं, पावन पावन बोध.
( सुंदरी छंद )
वसु धरापति देव स्वयंप्रभु, अरज दास तनी सुनिये विभु;
मम सु भूलि वसे बहु कर्म ये, चिर लगे भव कष्ट महा दिये. १
भजनमाळा ][ १६३