करन मत्सर के पर भावतें, बहुरि विघ्न भरे दुर भावतें;
करत साधनको उपघात सो, दरश ज्ञान प्रभात नसात सो. २
दुरत ज्ञान सु पंच प्रकार है, दरश आतमको न निहार है;
द्विविध वेदनी कर्म तृतीय है, रस शुभाशुभ देत स्वकीय है. ३
प्रथम सो सुखदायक मानिये, बंधत सो इह भांति प्रमानिये;
सकल जीव व्रती जनकी दया, बहुरि दान चतुर्विध को दिया. ४
धरत संयम राग लिये सु जो, करत योगनकी चलता न जो;
असत होत जु दुःख विशेषतें, रुदन पान रू शोक कुवेषतें. ५
करत है वध जो दुरभावतें, अरु करे परिदेवन आवतें;
स्व परके परतें परनाम ये, परत बंध महा दुःखधाम ये. ६
भनत रूप विरूप सुदेवको, निगम संघ रु धर्मसु भेवको;
दरशमोह जु बंधमहान ये, परत आतम शक्ति दुरान ये. ७
वश कषाय उदै परिनाम जो, करत चारित मोह जु तीव्र जो;
दरश चारित द्वैविध मोह ये, करत हैं निज शक्ति विछोह ये. ८
बहु परिग्रह आरंभ जास के, नरक आयु बंधे जिय तास के;
कुटिल वा तिर्यंच गति सुदा, अलप आरंभ मानव जन्मदा. ९
सहित राग असंजम संजमं, पुनि अकाम तु निर्जरतापमं;
तप अज्ञान रू सम्यक् हेतु है, सुभग देवगति यह देतु है. १०
इम चतुर्विध आयु सू कर्म है, कुटिल योग विवाद सू धर्म है;
अशुभ नाम कुबंध सू लेत है, उलटी जो इनतें शुभको वहै. ११
१६४ ][ श्री जिनेन्द्र