Shri Jinendra Bhajan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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तुरत बंध करें शुभ नाम ते, द्विविध नाम भनें मतिधाम ते;
करत जो परकी विकथा कुधी, बहुरि आतम शंस करे सुधी. १२
परतनें गुनकुं जु दुरात है, कुल जु नीच वहे नर पाता है;
करत जो इनतें विपरीतता, धरत है कुल उच्च पुनीतता. १३
कर्म गोत्र सु द्वैविध यों कहे, करत विघ्नअलाभ महा लहें;
यह कुभाव टरें उरतें जबे, सुखित होय रहे शिवमें तबे. १४
बिरद दीनदयाल संभारिये, दुःखित देख दया कर धारिये;
तिमिर मोह महा उरतें हरो, निज स्वरूप प्रकाशि सुखी करो. १५
( छंद तरंगि )
विधि अनोकुहकी जरकी निरमूलता,
सुभग आतमके गुनकी अति थूलता;
विघनकी हरनी करनी दुःख साल है,
जिन स्वयंप्रभुकी जयदा जयमाल है.
( अडिल्ल छंद )
स्वयंप्रभु जिनदेव सेव जो जन भजे,
थिर करि मनवचकाय अनाकुलता सजे;
करे वास उर जास रूप जग भूपको,
उदय होत है प्रकट भानु निजरूपको.
भजनमाळा ][ १६५