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श्री ´षभानन जिन – स्तवन
( दोहा )
तालु ओष्ठ के स्पर्श बिना, धुनि घनसम अवदात,
प्रकटत भ्रमतम हरनकूं, तरुण किरण मनु प्रात.
( पद्धरी छंद )
जय ॠषभानन सुनि जगत भूप,
मैं एक भावमय निजस्वरूप;
चिरतें पर परणति संगपाय,
परिवर्तन भाव धरे अघाय. १
निज पर मिल मूल सुभाव पांच,
पहिचाने मुनि तुम वचन सांच;
पहलो उपशम जानो सु एव,
सो सम्यक्चारित युगलभेव. २
दूजो क्षायिक सो नव प्रकार,
है ज्ञान दरश अरु दान सार;
चिद लाभ भोग उपभोग जान,
वरवीर्य सु सम्यक् चरण मान. ३
ये प्रकट लसें तुममें सदेव,
है मिश्र अष्ट दशरूप एव;
१६६ ][ श्री जिनेन्द्र