Shri Jinendra Bhajan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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मति श्रुतावधि ज्ञान रू कुज्ञान,
मनपर्यय पुनि त्रय दरश जान.
सो चक्षु अचक्षु रू अवधि एव,
पुनि लब्धि पंचविध है स्वमेव;
शुचि दान लाभ भोगोपभोग,
युत वीरज पंच भये सयोग.
सम्यक् अरु चारित युगल जान,
संयमासंयम सु एक मान;
इम सब मिल वसु दश भाव येह,
क्षय उपशम बल प्रकटे सु जेह.
उदयिक एक विंशति प्रकार,
वरने जगपति जु तुम निहार;
गति नारक पशु नर सुर सु चार,
तम मान कुटिल लालच असार.
तिय पुरुष नपुंसक वेद तीन,
मिथ्यादर्श रू अज्ञान चीन;
पुनि असिद्धत्व वामें पिछान,
लेश्या षट कृष्ण रू नील जान.
कापोत पीत अरु पद्म एव,
पुनि शुक्ल छठ्ठी जानो सु भेव;
भजनमाळा ][ १६७