मति श्रुतावधि ज्ञान रू कुज्ञान,
मनपर्यय पुनि त्रय दरश जान. ४
सो चक्षु अचक्षु रू अवधि एव,
पुनि लब्धि पंचविध है स्वमेव;
शुचि दान लाभ भोगोपभोग,
युत वीरज पंच भये सयोग. ५
सम्यक् अरु चारित युगल जान,
संयमासंयम सु एक मान;
इम सब मिल वसु दश भाव येह,
क्षय उपशम बल प्रकटे सु जेह. ६
उदयिक एक विंशति प्रकार,
वरने जगपति जु तुम निहार;
गति नारक पशु नर सुर सु चार,
तम मान कुटिल लालच असार. ७
तिय पुरुष नपुंसक वेद तीन,
मिथ्यादर्श रू अज्ञान चीन;
पुनि असिद्धत्व वामें पिछान,
लेश्या षट कृष्ण रू नील जान. ८
कापोत पीत अरु पद्म एव,
पुनि शुक्ल छठ्ठी जानो सु भेव;
भजनमाळा ][ १६७