अजितकी जयदा जयमाल ही, धरत कंठ लहें शिवबाल ही.
संजातक अरु स्वयंप्रभु सुखदायजी;
ॠषभानन अरु अनंतवीर्य मनमोहने,
सूरप्रभु रू विशालप्रभु अति सोहने.
चंद्रबाहु रू भुजंगम इश्वर सार हैं;
नेम प्रभु अरु वीरसेन वरनाम ये,
महाभद्र अरु देवयश हि अभिराम ये.
हरें तिमिर मिथ्यात्व करें सब सेव हैं;
इन्हें भक्ति धरि भव्य यजे मन ल्याय के,
ते नर सुरसुख भोगि वरें शिव जाय के.