पर्याय अनंत लिये जु ताही, झलके गुनभाग अनंत मांहीं;
अनुभव करिके वरने जु केम, मिसरी चखि मूक भनें न जेम. ४१
जिय जातिविरोधी वैर छांडी, उर प्रीति धरें आनंद मांडी;
तहं रोग शोक व्यापे न भूर, दुःख सकल नशें आए हजूर. ४२
दुःख द्वेष दोष वर्जित विराग, तव राग भये नाशें कुराग;
इम अतिशय असम धरें अपार, मंडित निराकुलसौख्य सार. ४३
यह छबि चिंतवन उपवन मझार, मेरो मन रमन चहे अपार;
अरजी अब ये सुनिये कृपाल, दुरभाव अविद्या टाल टाल. ४४
समरस सुख निज उर मंडिमंडि, पर चाहदाह दुःख खंडिखंडि;
प्रकटो उर पर उपकार वानी, निशदिन उचरूं तुम सुगुन गान. ४५
तुम वैन सुधारस पान सार, चाहुं भव भव आनंदकार;
तुम भक्त संतजनको सुसंग, मति होहु कुमति धरको प्रसंग. ४६
परनिंदा पर पीडत कुवानि, मति होहु कभी निज सुगुन हानि;
सद्गुरु चरणांबुज सेव सार, दीजे जगपति भव भव मझार. ४७
तुम दरश करुं परतक्ष देव, यह चाहि हिये वरते सुमेव;
पावें जब लों नहीं मोक्ष थान, तबलों यह देहु दयानिधान. ४८
हम जाचत हैं कर जोरि जोरि, अघबंधन मेरे तोरि तोरि;
निजबोध सुधा सुखको भंडार, अब ‘थान’ हिये प्रकटो अपार. ४९
( दोहा )
कननि नंद आनंदकर, करो विघ्नगन नाश;
पद्मचिह्न ध्वज जनमथल, नगरी अयोध्या जास.
२०६ ][ श्री जिनेन्द्र