जिनभक्त तनो तिहं तक प्रवेश, पुनि दुतिय पीठ कलधौत भेश;
चव धनुषतुंग ध्वजयुत स्वरूप, तहां मंगल द्रव्य धरे अनूप. ३१
पुनि तृतीय पीठ नग जटित सार, चव धनुष तुंग रचना अपार;
तिह उपर गंधकुटी रसाल, छबी पूरती गंध करे विशाल. ३२
सुरतरुके पुष्पनिकी अनूप, लूंबत है माल रसाल रूप;
युतपत्रपुष्प किसलय अपार, छबियुत अशोक तरु शोकहार. ३३
पदतर चवसिंहन के सुरूप, यह विष्टर सिंह लसे अनूप;
सब रतनजटिल सोहे अपार, सुरधनुसम प्रसरित ज्योति जार. ३४
तिहपें चतुरंगुल व्योम टार, पद्मासन जिन छबि निराधार;
अनुपम भामंडलको उद्योत, लखी कोटिक रवि छबि छीन होत. ३५
भविजनकुं भव दरसात सात, महिमा तिनकी वरनी न जात;
घनसम धुनि सब भाषा जतात, भ्रमवंशअंश कहुं ना रहात. ३६
शिर छत्र तीन शशिकुं लजात, प्रभुता तिहुं लोकनकी जितात;
सित चामर गंग तरंग जेम, चवसठ मित सुर ढारें सपेम. ३७
तुम धुनि बल मनु हरि मदनबान, तुम ढिग डारत सुरमुद महान;
सो पुष्पवृष्टि वरनी न जात, जस केतु पराजय कुं जितात. ३८
जगजीवन कुं धुनि पूरि इष्ट, सुर ताडित दुंदुभिनाद मिष्ट;
रिपु मोह जयो ह्वै के निरोष, मनु तास विजय भाषे सुघोष. ३९
क्रीडा चिदचिंतन अतुल जास, कवि कौन कहे बुधि बल विकास;
षट् द्रव्य अमित शक्ति न अंत, तिहुं कालमयी सत्ता अनंत. ४०
भजनमाळा ][ २०५