Shri Jinendra Bhajan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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वेदी तजि ध्वजपंक्ति विशाल, इक योजन पंचम भू रसाल;
पुनि रजत कोट पूरव समान, राजें अनुपम रचना निधान. २१
दरवान जहां सुरनाग जान, सन्मुख अद्भुत राजे महान;
पुनि छठवीं भुमि योजन मझार, वन कल्पवृक्ष सोहे अपार. २२
तरु सिद्ध चहुं दिश है शुभेश, युत सिद्ध बिंब राजें नगेश;
मंदारन मेरुक पारिजात, संतानकयुत इम चार भांत. २३
वेदी तजि पुनि योजन सू आध, भुवि सप्तमी राजत हरि विषाद;
चहुं दिशमें नव नव तूप शृंग, जिनप्रतिमायुत छबिके प्रसंग. २४
पुनि फटिक कोट शोभा अमान, सबतें अद्भुत राजे महान;
गोपुर पन्नासम लसत जास, सुरकल्प सुभग दरवान जास. २५
गलियनकी वेदी युत महान, वेदी तक षोडश भींत जान;
तिनपैं खंभन पर फटिकरूप, श्री मंडप राजत है अनूप. २६
मुक्ताफलमाला रत्नघंट, घटधूप आदि रचना महंत;
सब थल तें अष्टम भू मझार, रचना अद्भुत आनंदकार. २७
तिनमें चहुं ओर गली जू टार, दश-दोय सभा शोभे सुसार;
मुनि कल्पसुरी अजिया सुजानी, तिय ज्योतिष व्यंतर भुवन मानि.
व्यंतर भावन ज्योतिष जू देव, कल्पामर नर पशु येम भेव;
पुुनि भीतर वेदी मध्य जानि, है प्रथम पीठ पन्ना समान. २९
वसु धनुष तुंग द्वय कोश व्यास, वसु पहल द्विगुन छवि गोल जास;
ता परि चारों दिश यक्ष देव, वृषचक्र धरें शिरपे स्वमेव. ३०
२०४ ][ श्री जिनेन्द्र