Shri Jinendra Bhajan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 203 of 208
PDF/HTML Page 213 of 218

 

background image
पुष्पनिकी वाडी है अनूप, मंडप जु अतान वितान रूप;
थल सुन्दर शिलतल है अपार, तित देव रमें आनंद धार. ११
पुनि स्वर्ण साल सोहै अपार, छबि मंडित मणिमय द्वार चार;
तोरन वंदन माला विशाल, बंगले मुक्ताफल माल भाल. १२
कंगूरे कटनी सीढी सुभेष, कंचन मणिमय राजे अशेष;
शुक कोक मयुरादिक स्वरूप, मणि चित्र विविध झलके अनूप. १३
सुरयक्ष तहा दरवान सार, नवनिधि द्वारे ठाडी अपार;
आगें दुहु ओरनकु महान, गलियें विचरनकुं शोभमान. १४
तिनमें द्वय द्वय अति रुचिररूप, घटधूप नृत्यशाला अनूप;
तहं द्रम द्रम द्रम बाजत मृदंग, सुरबाल नचे वर तालसंग. १५
सननन सारंगी सनन नात, पग नूपुर झननन झनझनात;
ताथेई ताथेई ताथेई चलंत, फिर फिर फिर फिर फिरकी लहंत. १६
लचकत कटि कर ग्रीवा सु सार, दरशात नव रस छबी अपार;
तननं तननं तननं सु बीन, गतिपूर बजें स्वर सप्त पीन. १७
लयग्राम गमक मूर्छा सुधार, उचरंत तरल तानें अपार;
इत्यादिक सजि श्यामा अनूप, जगपति जस वरनत भक्तिरूप. १८
वन चार चहूं कोने मझार, युत वेदी गिरि सर सरित सार;
वापी बंगले रज रत्नरूप, क्रीडे सुर नर खग तहां अनूप. १९
चंपक छद सप्त अशोक आम, तरु चैत्य चैत्ययुक्ताभिराम;
इक योजन चोथी भूमि येम, अब वरनत हैं आगे सु जेम. २०
भजनमाळा ][ २०३