Shri Jinendra Bhajan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 202 of 208
PDF/HTML Page 212 of 218

 

background image
( दीपकला छंद )
जय अजितवीर्य वीरज अपार, तुमकुं मम प्रणमन बारबार;
सुख आशा धरि चिरतें जिनेश, भवमें हम श्रम ठाने अशेष.
सुख जाति निराकुलता न जानि, जडसंग कीनी निज शक्ति हानि;
गुरुके मुखतें अब भेद पाय, निजमें तुमरूप रह्यो सु छाय.
तुम समवसरन रचना वखान, नहि वरन सकें धरि चार ज्ञान;
निज नरभव पावन करन हेत, मैं वरनुं कछु आनंद उपेत.
धनु पांच सहस भुवितें उत्तंग, सोपान सहस विंशति अभंग;
लंबे इक कोश तने सुजानि, इक कर उन्नत आयाम मानि.
योजन तसु द्वादस व्यासरूप, मणि-नील-शिला उतरी अनूप;
तहां प्रथम शाल वर धूलिशाल, पण रत्नरचित युत छबी विशाल.
तिहके चव द्वारनितें सुजान, चौरी इक कोश गली महान;
मणि फटिक भींति चहुं दिश अनूप, इह गंधकुटी तक रुचिर रूप.
तिन मध्य प्रथम चहुं दिश मंझार, चव वापि संयुत छबी अपार;
जिनबिंब धरे सुचि मानथंभ, मानी-मन-मद-मर्दन उत्तंग.
चहुं ओर अवनि धुर वलयरूप, प्रासाद पंक्ति तिहमें अनूप;
पुनि वेदी तज कीने प्रवेश, भूमि द्वितीय मध्य खाई शुभेश.
मणिमय तट विकसित कंजव्रात, सोपान रतनमय मन लुभात;
शुक सारिक मोर मराल वृंद, द्विज केलि करे नाना अमंद.
इम धूलीशालथकी सु जानि, खाई तक योजन एक मानि;
पुनि वेदी तजी तृतीय सार, सुवलय इक योजन मान धार. १०
२०२ ][ श्री जिनेन्द्र