स्तवनमाळा ][ १२७
धन्य दिवस यह आज धन्य घडी भली है,
धन्य तुम्हारी बुद्धि धन्य तुम जोग्य यही है. ८.
हम मतिमंद कहा कहे तुम आप प्रबुद्धी,
हम नियोगतें कहि नमो कहि गये सुबुद्धी;
सौधर्मादिक इन्द्र आय पालकी सवारी,
प्रभु शृंगार कराय स्वजन ममता निरवारी. ९.
चढे पालकी आप प्रथम लीनो नरराजा,
पुन इन्द्रादिक देव लेेय उद्यान विराजा;
उत्तर शुद्ध छिति निरखि वृक्ष तल योग सुधारा,
वस्त्राभूषण डार लोंच मुष्टि कर डारा. १०.
होय दिगम्बर ‘सिद्ध नमः’ कहि ध्यान सु लीनो,
इन्द्रादिक तब पूजि तीसरो मंगल कीनो;
संयम धारत ज्ञान तूर्य प्रभुको ततक्षिण ही,
एक मुहूरत मध्य भयौ भाख्यो सब तुम ही. ११.
केश पंचम उदधि क्षेप निज थान गये सब,
प्रभु पूरण कर योग पारणौ कर आये तब;
नाना विध तप घोर कियो चूरण करमन को,
सो प्रभु होउ सहाय हरो दुःख मेरे मनको. १२.
( दोहा )
चौवीसों जिनरायके, मंगल परम रसाल,
जो पढसी सुनसी सदा, पासी मोक्ष विशाल. १३.
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