Shri Jinendra Stavan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१२८ ][ श्री जिनेन्द्र
ज्ञानकल्याणक वर्णन
( सोरठा )
होय दिगंबर रूप, क्षपक श्रेणि पुनि मांडि करि,
भये संयोगी भूप, नमो तासु वसु अंग नमि. १.
( पद्धडी छंद )
जब प्रगट्यो जिन केवल सुभान,
आसन कंप्यो सुर असुर जान;
धनपति आज्ञा दीनी सुरेश,
समवसृत आय रच्यो जिनेश. २.
इन्द्र हु परिवार समेत आय,
जिन पूज भक्ति कीनी बनाय;
नर खग पशु असुर नमे जिनाय,
बैठे निज निज कोठे सभाय. ३.
तब समवशरण लखि इन्द्र हर्ष,
तसु किंचित् वर्णन लिखौ पूर्व;
प्राकार नीलमणि भूम सार,
चहुं दिश शिवाण विस विस हजार. ४.
तपै सु कोट धनु किधौं आई,
धूलिसाला पण रत्न भाई;
चहुं दिश मैं मानस्तंभ चार,
त्रै कोट रु कटनी धुजा सार. ५.