Shri Jinendra Stavan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१३० ][ श्री जिनेन्द्र
चव कोट मध्य वेदिका पांच,
अंतर में नाना विविध रांच. ११.
कहुं मंदिर पंकति शिला जोग,
सामानिक गंधकुटी संजोग;
ताके मध कटनी तीन राजा,
तापै ओ गंधकुटी जु छाज. १२.
तामें सिंहासन कमलसार,
जिन अंतरीक्ष शोभें अपार;
इत्यादिक वर्णन को समर्थ,
अब कहों छियालिस गुण सु अर्थ. १३.
जय जन्मत ही दश भये एह,
बलनंत अतुल सुंदर सु देह;
जय रुधिर श्वेत अरु वचन मिष्ट,
शुभ लक्षण गंध शरीर सिष्ट. १४.
जय आदि संहनन संसथान,
मल रहित पसेवहु रहित मान;
पुन केवल ऊपजे दश जु एम,
विद्येश्वर सब चतुरान नेम. १५.
आकाश गमन अदया अभाव,
दुरभिक्ष जु शत जोजन न पाव;
अब इन पांचनसों रहित देव,
उपसर्ग केश नख वृद्ध सेव. १६.