१४२ ][ श्री जिनेन्द्र
इन्द्र ऐरावत हाथी लई आव्या छे,
मानस्तंभेथी आभूषण आव्या छे,
मारा नाथने मेरूए लई चाल्या छे...मारा.
सहस्र लोचन इन्द्र बनावे छे,
जिनरूप लळी लळी नीरखे छे,
नयनो तृप्ति नहि पावे छे....मारा.
क्षीरसागरथी जल लावे छे,
जिनराजने अभिषेक करावे छे,
शक्रराजनां दिलडां उल्लसे छे....मारा.
आज तांडव नृत्यो सोहे छे,
गंधोदक वरसा वरसे छे,
जिनमहिमा जगते गाजे छे....मारा.
लोकालोक विकासी जिनराया छे,
जगसाक्षी महा गंभीरा छे,
भवभयहारी भगवंता छे....मारा.
गुणरत्न नाथ पधार्या छे,
मुज आंगण कल्पतरु फळीया छे,
गुरुराज प्रतापे जिन मळीया छे....मारा
सेवकनां हैडां हरख्यां छे....मारा.
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