स्तवनमाळा ][ १५५
मुनिसुव्रत व्रतकरण नमत सुरसंघहिं नमि जिन,
नेमिनाथ जिन नेमि धर्मरथमांहि ज्ञानधन. ४.
पार्श्वनाथ जिन पार्श्व उपलसम मोक्ष रमापति,
वर्द्धमान जिन नमूं वमूं भवदुःख कर्मकृत.
या विधि मैं जिन संघरूप चउबीस संख्य धर,
स्तवूं नमूं हूं बारबार वंदू शिव सुखकर. ५.
श्री मानस्तंभ – स्तवन
(मोतियादाम छंद)
ज्यौ जगमें जिनराज महान,
ज्यौ तुम देव महाव्रत दान;
सुजन्मविषें सुर चार निकाय,
कियौ बहु उत्सव पुन्य बढाय.
सुरेन्द्र नरेन्द्र नवावत शीस,
मुनीन्द्र तुम्हें नित ध्यावत इश;
सु बालहितें प्रभु शील – स्वरूप,
विराग सदा उर भाव अनूप.
भये जब जोबनवंत महान,
न काम विकार भयौ गुनखान;
कियौ नहिं राज धरे व्रतसार,
सुरासुर पूज कियौ तिहिं वार.
सुघाति महारिपु चार प्रकार,
भये वर केवलज्ञान अपार;