१५४ ][ श्री जिनेन्द्र
दीनबंधु दुखहरण जिनेश्वर! तुम ही हो मेरे,
स्वामी तुम ही हो मेरे.
द्यो शिवधामको वास दास, हम द्वार खडे तेरे. जय०
विपद विकार मिटाओ मनका विनय सुनो दाता,
स्वामी विनय सुनो दाता.
सेवक द्वय कर जोड प्रभूके चरणों चित लाता. जय०
श्री जिन – स्तवन
नमौं ॠषभ जिनदेव अजित जिन जीति कर्मको,
संभव भवदुःखहरण करण अभिनन्द शर्मको.
सुमति सुमति दातार तार भवसिंधु पार कर,
पद्मप्रभ पद्माभ भानि भवभीति प्रीति धर. १.
श्री सुपार्श्व कृतपाश नाश भव जास शुद्ध कर,
श्रीचंद्रप्रभ चंद्रकांतिसम देह कांतिधर.
पुष्पदंत दमि दोषकोश भविपोष रोषहर,
शीतल शीतलकरण हरण भवताप दोषकर. २.
श्रेयरूप जिनश्रेय ध्येय नित सेय भव्यजन,
वासुपूज्य शतपूज्य वासवादिक भवभय हन.
विमल विमलमति देन अंतगत हैं अनंत जिन,
धर्म शर्म शिवकरण शांतिजिन शांतिविधायिन. ३.
कुंथु कुंथुमुख जीवपाल अरनाथ जाल हर,
मल्लि मल्लसम मोहमल्ल मारण प्रचार धर.