स्तवनमाळा ][ १५३
अविनाशी आनंदमय, गुण पूरण भगवान,
शक्ति हिये परमातमा, सकल पदारथ ज्ञान.
चारों करम विनाशिके, ऊपज्यो केवलज्ञान,
इन्द्र आय स्तुति करी, पहुंचे शिवपुर थान.
श्री पार्श्वनाथ जिन – स्तवन
(चाल – जय जगदीश हरे)
जय पारस देवा, स्वामी जय पारस देवा,
सुर – नर – मुनि – जन तुव चरणनकी करते नित सेवा. टेक.
पौष वदी ग्यारस काशीमें आनंद अति भारी,
स्वामी आनंत अति भारी,
अश्वसेन वामा माता उर लीनों अवतारी. जय०
श्याम वरण नव हस्त काय पग-उरग लखन सोहै,
स्वामी उरग लखन सोहै,
सुरकृत अति अनूप पट भूषण सबका मन मोहै. जय०
जलते देख नाग नागिनको मंत्र नवकार दिया,
स्वामी मंत्र नवकार दिया,
हरा कमठका मान ज्ञानका भानु प्रकाश किया. जय०
मात पिता तुम स्वामी मेरे आश करूं किसकी,
स्वामी आश करूं किसकी,
तुम बिन दाता और न कोई शरण गहूं जिसकी. जय०
तुम परमातम तुम अध्यातम तुम अन्तरयामी,
स्वामी तुम अन्तरयामी,
स्वर्ग – मोक्षके दाता तुम हो त्रिभुवनके स्वामी. जय०