१५२ ][ श्री जिनेन्द्र
विश्वदिवाकर नाथ सीमंधर, कुंदनयनना तारा,
जगनिरपेक्षपणे जगज्ञायक, वंदन कोटि अमारां;
— तात! जगतारणहारा रे,
जगत आ तुजथी उजियारा.
हे जिनवर! तुज चरणकमळना भ्रमर श्री क्हान प्रभावे,
जिन पाम्यो, निज पामुं अहो! मुज काज पूरां सहु थावे;
— आश मुज करजो रे पूरी,
उभय अणहेतुक-उपकारी.....स्वर्ण०
श्री जिन – स्तवन
(राग – सवैया)
ध्यानहुताशनमें अरिईंधन, झोंक दियो रिपु रोक निवारी,
शोक हर्यो भविलोकनको वर, केवलज्ञान मयूख उघारी.
लोकअलोक विलोक भये शिव, जन्मजरामृत पंक पखारी,
सिद्धन थोक बसै शिवलोक, तिन्हैं पग धोक त्रिकाल हमारी.
तीरथनाथ प्रनाम करैं तिनके गुणवर्णनमें बुधि हारी,
मोम गयो गलि मूसमझार रह्यौ तहं व्योम तदाकृति धारी.
लोक गहीर नदीपति नीर गये तरि तीर भये अविकार,
सिद्धन थोक बसें शिवलोक तिन्हैं पगधोक त्रिकाल हमारी.
(दोहा)
अविचल ज्ञान – प्रकाशतैं, गुण अनंतकी खान,
ध्यान धरै सो पाईये, परमसिद्ध भगवान.