स्तवनमाळा ][ १५७
इत्यादि अनेक सुभेद बताय,
सुभव्य दिये शिवपंथ लगाय;
सुजोग निरोध कियौ शिववास,
करौ हमरो नज पास निवास.
श्री जिन – स्तवन
हे त्रिभुवनगुरु जिनवर, परमानदैकहेतु हितुकारी,
करहु दया किंकर पर प्राप्ति ज्यों होय मोक्ष सुखकारी. १
हे अर्हन् भवहारी भवथितिसे मैं भयौ दुखी भारी,
दया दीन पर कीजे, फिर नहिं भववास होय दुखकारी. २
जगउद्धार प्रभो! मम, करि उद्धार विषम भवजलसे;
बारबार यह विनती करता हूं मैं पतित दुखी दिलसे. ३
तुम प्रभु करुणासागर, तुम ही अशरणशरण जगतस्वामी,
दुखित मोह – रिपुसे मैं, यातैं करता पुकार जिननामी. ४
एक गांवपति भी जब, करुणा करता प्रबल दुखित जन पर,
तब हे त्रिभुवनपति तुम, करुणा क्यों न करहु फिर मुझ पर. ५
विनती यही हमारी, मेटो संसारभ्रमण भयकारी,
दुखी भयौ मैं भारी, तातैं करता पुकार बहुवारी. ६
करुणामृतकर शीतल, भवतपहारी चरणकमल तेरे,
रहें हृदयमें मेरे जबतक हैं कर्म मुझे जग घेरे. ७
पद्मनंदि गुण बंदित, भगवन्! संसारशरण उपकारी,
अंतिम विनय हमारी, करुणा कर करहु भवजलधि पारी. ८