१५८ ][ श्री जिनेन्द्र
दर्शन – स्तोत्र
अति पुण्य उदय मम आया, प्रभु तुमरा दर्शन पाया;
अब तक तुमको विनजाने, दुख पाये निज गुण हाने.
पाये अनंते दुःख अबतक, जगतको निज जानकर;
सर्वज्ञभाषित जगतहितकर, धर्म नहिं पहिचानकर.
भवबंधकारक सुखप्रहारक, विषयमें सुख मानकर,
निजपर विवेचक ज्ञानमय, सुखनिधि सुधा नहिं पानकर. १
तव पद मम उरमें आये, लखि कुमति विमोह पलाये,
निज ज्ञानकला उर जागी, रुचि पूर्ण स्वहितमें लागी.
रुचि लगी हितमें आत्मके, सत्संगमें अब मन लगा,
मनमें हुई अब भावना, तव भक्तिमें जाउं रंगा.
प्रियवचनकी हो टेव, गुणि – गुण – गानमें ही चित पगै,
शुभ शास्त्रका नित हो मनन, मन दोषवादनतैं भगै. २
कब समता उरमें लाकर, द्वादश अनुप्रेक्षा भाकर,
ममतामय भूत भगाकर, मुनिव्रत धारूं वन जाकर.
धरकर दिगंबररूप कब, अठवीस गुण पालन करूं,
दोवीस परिषह सह सदा, शुभधर्म दश धारन करूं.
तप तपूं द्वादशविधि सुखद नित, बंध आस्रव परिहरूं,
अरु रोकि नूतन कर्म संचित, कर्मरिपुकों निर्जरूं. ३
कब धन्य सुअवसर पाऊं, जब निजमें ही रमजाऊं,
कर्तादिक भेद मिटाऊं, रागादिक दूर भगाऊं.