स्तवनमाळा ][ १७१
वंदे ढाई द्वीप तेरा द्वीपके सकल चैत्य तीन लोकमांहि,
बिम्ब पूज आवै नित्य नित्य आवै वो झपट समही,
पै दौडा लेने दम करे छम छम मन मोहन मुसकाके. ३
अमृतकी लागी झर बरषै रतनधारा,
सीरी सीरी चाले पौन बोले देव जय जयकार.
भर भर झोरी वरषावै फूल दे दे ताल,
महकै सुगन्ध चहक मुचंग षट्ताल;
जन्मे यों जिनेन्द्र भयो नाभिके आनन्द,
‘नयनानंद’ यों सुरेन्द्र गये भक्तिको बतलाके. ४
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श्री वृषभजिन – स्तवन
(बधाई)
आज तो बधाई राजा नाभिके दरबारजी. टेक.
मरुदेवी पुत्र जायो, जायो ॠषभकुमारजी,
अयोध्यामें उत्सव कीनों, घर घर मंगलाचारजी. १.
घननन घननन घंटा बाजे, देव करै जयकारजी,
इद्राण्यां मिलि चौक पुरायो, भर भर मोतियन थारजी. २.
हाथ जोर मैं करूं विनती, प्रभु जीवो चिरकालजी,
नाभिराजा दान देवैं, बरषै रतन अपारजी. ३.
हस्ती दीना घोडा दीना, दीना रथ भंडारजी,
नगर सरीखा पट्टण दीना, दीना सब सिंगारजी. ४.